बुधवार, 3 सितंबर 2014

Fwd: "गुरु-शिष्य" के लिए,



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From: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>
Date: Thursday, September 4, 2014
Subject: "गुरु-शिष्य" के लिए,
To: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>


"गुरु-शिष्य" के लिए,
आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर देश के सभी शिक्षकों का अभिनंदन।
आज प्रधान मंत्री "श्री नरेन्द्र मोदी जी" देश के छात्रों एवं शिक्षक को संबोधित करते हुए कुछ कहना चाहते हैं।

मै उनकी इस आयोजन का समम्ान करते हुए देश के हर शहर एवं गांव, नगर,महानगर मे यदि आज के दिन एक सार्वजनिक स्थान का चयन किया जाय ।

"छात्र एवं शिक्षक " के साथ हर  विद्यार्थि के "माता-पिता" या "अभिभावक" उपस्थित हो कर इस पहले एवं महत्वपूर्ण अवसर का लाभ उठाएं।

इस आयोजन के लिए "सिनेमा घर" उपयुक्त हो सकता है वहाँ बैठने की व्यवस्था एवं समस्त सुविधाएं पहले से मौजूद रहती हैं।

धन्यवाद
शबनम वर्मा
बैंगलोर (कर्नाटका)



Shabnam Verma
Bangalore

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

पेड़ और माली

                         पेड़ और माली

सब की एक कहानी होती है। सबका एक समय होता है। 
फलों से लदा हुआ पेड़ कभी उस एक बीज के बारे मे कहां सोचता है ? जिसे किसी माली ने बोया और सींचा था। 
बीज कैसे पेड़ बना और फलों से लदा? 
इस कहानी को सुनने के लिए समय कहां है? पेड़ तो अपने फलों को गिन कर ही खुश हो रहा है। माली भी अब कहां ? 
उसे तो और भी कई पेड़ लगाने थे। माली की भी अपनी ही कहानी थी। बीज से पेड़, पेड़ से फल, फल से बीज के चक्र को अंजाम देता रहा। बहुत समय बीत गया पर माली कभी उस बड़े पेड़ के पास नही गया। पेड़ हर साल माली का इंतजार करता। 
अचानक एक दिन माली थका हारा उस बड़े पेड़ के नीचे रूका... पेड़ खुशी से झूम कर माली का स्वागत किया। कई फल माली के कदम चूमने लगे, माली पेड़ का आकार देख कर खुश था। 
फल खा कर तृप्त हुआ। थोड़ा विश्राम करने के बाद माली फिर चल पड़ा। उसी पेड़ के कुछ फल और बीज अपने हाथों मे सम्भालते हुए। वह और पेड़ लगाएगा। पेड़ भी खुशी से झूमता और इतराता रहा। पेड़ सोच रहा था....."एक बीज के बदले कई बीज माली को दे कर उसने आज माली का कर्ज चुका दिया"। माली सोच रहा था...."परिश्रम का फल मीठा था"।

जिम्मेदारी


जिम्मेदारी

गांव में एक किसान अपनी पत्नी एवं चार पुत्रों के साथ रहता था।अपने पुत्रों का विवाह यथा समय करके निशचिन्त हो गया था। परिवार मे एकता एवं खुशहाली थी परंतु किसान की पत्नी खुश नही थी। वह हमेशा चिन्तित रहती, एक दिन किसान अपनी पत्नी से उसके चिन्ता का कारण पूछा।
पत्नी बोली.. मेरी सभी पुत्रवधुएं समझदार है, मुझे समझ मे नही आ रहा कि भंडार की चाबी किसे दूँ? किसान बोला.. अरे इतनी सी बात के लिए चिन्ता क्यों करती हो?
दूसरे ही दिन सबेरे किसान ने अपनी चारों पुत्रबधुओं को अपने पास बुलाया और एक थैलै से एक - एक मुट्ठी गेहूं निकाल कर सभी बहुओं के हाथ मे दे कर बोला कि इसे ठीक से रखना, जब मैं मांगूंगा तब वापस देना। 
गेहूं लेकर बहुएं अपने काम मे लग गईं। बड़ी बहू गेहूं की पोटली बना कर बक्से मे रख दी।
मंझली बहू गेहूं को कागज की पुड़िया बना कर भंडार मे रख दी। संझली बहू गेहूं अपने पल्ले मे बांध ली। छोटी बहू उसी दिन अपने मायके जा रही थी, गेहूं  की पुड़िया अपने साथ ले गई। 
कई दिन बीतने पर किसान की पत्नी किसान से पूछी.. आपने मुझसे चिन्ता का कारण पूछे थे, परंतु उसका निवारण तो अभी तक नही बता पाए, किसान बोला....अभी समय नही आया, जब समय आएगा मै तुम्हे बता दूंगा, अभी चाबी तुम अपने ही पास रखो,और चिन्ता मत करो।
पांच वर्ष बीत गए। किसान की पत्नी फिर एक दिन बहुत उदास थी, किसान के पूछने पर बोली, अब मैं चाबी नही रखना चाहती, आपने क्या सोचा है? 
किसान उसी समय अपनी चारों बहुओं को अपने पास बुलाया और गेंहूं की पुड़िया वापस मांगा।
संझली  बहू सबसे पहले अपने पल्ले मे से गेहूं के कुछ दाने निकाल कर दे दी। बड़ी बहू बक्से मे से गेहूं की पोटली निकाल कर ले आई। मंझली बहू भंडार से एक पुड़िया मे गेहूं ले आई। छोटी बहू  बोली... पिताजी मुझे थोड़ी मुहलत चाहिए, अभी मेरा मायके जाना आवश्यक है। मैं दो दिन के बाद ही गेंहू वापस करूंगी। किसान बोला .....ठीक है। अब घर के वातवरण मे थोड़ी हलचल होने लगी। छोटी बहू ने गेहूं क्यों वापस नही की? आज ही मायके क्यों जाना पड़ा,वगैरह..वगैरह!!
छोटी बहू दूसरे दिन मायके से वापस आ गई साथ मे बैल गाड़ी पर गेहूं के कई बोरे भी थे। किसान और उसका पूरा परिवार आश्चर्य चकित थे,एक मट्ठी गेहूं के बदले इतना गेहूं? 
छोटी बहू ने जब बताया कि किस तरह उसने मुट्ठी भर गेहूं अपने भाई के पास सुरक्षित रखने के लिए दिया,और भाई ने उसे अपने खेत मे  बो दिया और उसके दानो को हर साल बीज के रूप मे इस्तेमाल किया। इस साल उसी बीज से इतनी उपज हुई, यदि पिताजी इस बार भी गेहू नही मांगते तो इसे फिर से सुरक्षित रखने के लिए खेतों मे ही बोया जाता। यह सब सुन कर सभी बहुत खुश हुए। अब किसान ने अपना फैसला सुनाया, उसने अपनी पत्नि से कहा .... अब तुम चारों बहू को अलग-अलग तरीके से घर की चाबी दे सकती हो।
बड़ी बहू को तिजौरी की चाबी दे सकती हो, मंझली बहू को  अनाज के भंडार की चाबी दे दो। संझली बहू को रसोई की चाबी देना, और छोटी बहू को रूपए-पैसों की जिम्मेदारी दे दो।
किसान की पत्नी अब सारी बातें समझ गई थी, उसकी चारों बहुएं अलग-अलग तरीके से निपुण थी। अत: सब मिल कर साथ में रहते हुए गृहस्थी सम्भाल लेंगी, चिन्ता की कोई बात नही।


शबनम वर्मा
बैंगलोर

सोमवार, 28 जुलाई 2014

मातृत्व

यदि एक स्त्री  मे मातृत्व के भाव वाला स्नेह है तो वह किसी भी बच्चे की मां बन सकती है, बस उसे खुद पर भरोसा करना होगा।'मां' एक शब्द नही, ना तो कोई साहित्य या किसी के द्वारा रची गई रचना है, 'मां' और 'मातृत्व' दो अलग-अलग भाव हैं, 'मा' बनना सबके बस मे नही। 'मातृत्व' का भाव सभी में होता है, बड़ी बहन अपने छोटे भाई -बहन के प्रति 'मातृत्व' की भावना रखती है, इसी तरह हर स्त्री अपने से 'छोटे' के लिए 'मातृत्व' वाला स्नेह रखती है।


क्या याद करूं मै

क्या याद करूं मैं! ..........

बड़वाह से बैंगलोर तक का सफर लंबा था।
कठिन भी रहा और दुखदाई भी।
तीस साल के इस सफर में,'क्या भूलूँ....क्या याद करूँ मैं!..............?
तीस साल की कहानी मैं कागज के एक पन्ने पर मात्र तीस मिनट मे लिख सकती हूँ।
मानो कुछ ही पल बीते हों।
१९८४ से २०१४तक।
लेकिन बड़वाह मे बिताए समय को ही याद करके अपने भाग्य को सराहने का मन होता है।
असल मे मध्य प्रदेश का यह छोटा सा शहर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है।
कुछ भी खास नही होते हुए भी मेरे लिए बहुत खास था यह शहर।
जब चाहे नर्मदा के दर्शन करना,नर्मदा की लहरों मे पैर डाले घंटों बैठ कर छोटे-छोटे गोल-गोल पत्थर बीनना,
नर्मदा के कंकर- कंकर में शंकर को ढूंढना। 
हम बड़वाह से ऊँकारेश्वर अक्सर ही जाते थे।
शादी के दस दिनों के बाद ही बड़वाह पहूँच गई थी।
छोटे से घर मे अपनी गृहस्थी बसा कर मैं खुश थी। कभी किसी चीज की कमी महसूस नही हुई।
खूब जोर से बातें करती,बात छोटी हो या बड़ी,जोर से हंसती थी। 
खाना जो भी पकाती बहुत स्वादिष्ट लगता।  
काले रंग का मिट्टी के घड़े के पानी का स्वाद अभी तक याद है। 
मुरमुरे और सेव को भी नही भूला जा सकता,दाल बाफले का स्वाद पहली बार वहीं चखी थी।
बनाना भी वहीं सीखी।
टीवी की हमे तब आवश्यकता नही थी। रेडियो मे गाने सुनती,अखबार पढ़ती,सिलाई कढ़ाई करती,
समय कैसे बीत जाता, पता नही चलता था। 
पता नही क्यों आस पड़ोस मे मेरी किसी से कभी दोस्ती नही हो पाई।
हां पत्र रोज लिखती किसी ना किसी को। हमारे पास भी रोज पत्र आते थे।
अब पत्रों की जगह मेल ने ले लिया।
साढ़े तीन साल बड़वाह मे रहे हम लोग। 
उसके बाद हमें एक छोटे से गांव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। गांव बड़वाह से तीन-चार घंटे की ही दूरी पर था। परंतु बहुत छोटा गांव। 
सीधे-साधे गांव के लोग, जिन्हे बाहरी दुनिया का ज्ञान तो था, 
पर वो अपने गांव के बाहर की दुनिया से दूर ही रहना पसंद करते।
गांव मे स्कूल,अस्पताल,दुकान के नाम पर सब कुछ था पर सिर्फ नाम के लिए।
वहां के लोग खेती करते और पास के शहर मे अनाज और कपास बेच कर बाकी जरूरत का सामान लाते।जीवन जीने के लिए जितने की जरूरत होती बस उतना।
कुछ साल के बाद हम जबलपुर आ गए।
जबलपुर मध्यप्रदेश का एक बड़ा शहर है,नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर खूबसूरत है।
सारी सुविधाएँ प्राप्त है। जबलपुर मे बहुत साल बीते।
बच्चे बड़े हो गए। घर का आकार भी बढ़ा, सामान भी बढ़ा।
फिर खरगोन जाने का मौका मिला। खरगोन मे भी काफी समय तक रहे।
इन शहरों में रहते हुए हम छिन्दवाड़ा भी खूब जाते। 
हम खरगोन से छिन्दवाड़ा पहूँचे। मध्य प्रदेश का छोटा लेकिन सुन्दर शहर।
छिन्दवाड़ा से जब मैं निकली तब की बातों को मैं भूलना चाहती हूँ।
बातें तो और भी हैं लिखने को,सब कुछ लिख पाना शायद सही नही।
तीस साल कैसे बीत गए? सुख-दुख आते जाते रहे,
और मै....मुस्कुराती रही!! सफर तय करती रही,सामान खरीदती और फेंकती रही!! 
सामान से घर बनाती रही,घर से गृहणी बनी रही!!
इंसान सामान खरीदते-फेंकते, कब खुद सामान बन जाता है!!
सफर तय करते-करते, इसका एहसास भी नही होता!!......😊


इस कविता में वो सारी बातें  लिखी हैं जो मैं नही लिख पा रही हूँ।


अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

याद सुखों की आसूं लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

दोनो करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
         
    
                                             हरिवंशराय बच्चन

अनहोनी

                                               अनहोनी 

'अनहोनी' मंदिर पचमढ़ी के पास है, हम पचमढ़ी से लौट रहे थे, 'अनहोनी' माता के दर्शन करने  मंदिर तक गए। वहां के पुजारी ने हमे देवी मां की महत्ता बताए। 
वहां एक गर्म पानी का कुन्ड प्राकृतिक रूप से है। 
सिर्फ गरम ही नही बल्कि खौलता हुआ पानी। कहा जाता है कि उस पानी से नहाने वाले को चर्म रोग नही होता, यदि चर्मरोग है तो वह पूर्ण रूप से रोग से छुटकारा पा सकता है, है ना आश्चर्य की बात? 
हां यही 'अनहोनी' बात  है  उस मंदिर की और कुन्ड मे नहाने की। हम भी इस आश्चर्य को देखने पहूंचे। वहां और भी कई लोग थे। देवी की पूजा गरम पानी मे नहाने के बाद ही करनी थी। 
लोटे से पानी निकाल कर धीरे-धीरे अपने ऊपर डाल कर नहाना था,या यूं कहें कि उस पानी को अपने ऊपर छिड़कना था। 
मै और दीदी महिलाओं वाली घाट पर नहा लिए। ये जीजाजी के साथ थे, दोनो नहा कर कपड़े बदल चुके थे। 
तभी जीजाजी की आवाज आई...रवि गिर गया.... मै दौड़ी कुंड के पास, वहां जो देखी वह बहुत भयानक था।
ये गरम कुंड में गिरे थे, चिल्ला रहे थे....मैं जल रहा हूं....मुझे बचाओ....बचाओ...बचाओ, 
मैं दीदी और जीजाजी कुंड के पास थे पर हम कुछ भी नही कर पा रहे थे। कुछ देर कोशिश करने के बाद ये स्वयं ही बाहर निकले। मै दूसरे कपड़े दी। कपड़े बदल कर वहीं चारपाई पर लेटे। 
बहुत डरे हुए थे,खूब जलन हो रही थी। हाथ पैर मे चोट भी लगी थी। 
बाद मे वहां के पंडित ने बताया कि किस तरह लोग 'चर्म रोग' के इलाज के लिए आते हैं, परंतु कईयों के साथ ऐसा भी हुआ कि इसी कुंड मे गिरे और पूरी 'चमड़ी' ही उधड़ गई। 
यही 'अनहोनी'.....जो 'हो' गई थी......!!

वो पांच दिन

वो पांच दिन

हां यह कहानी उन पूरे पांच दिनों की है जब 'काल' मेरे घर में आया था। उन पांच दिनों तक मैं रोज सुबह उठती और अपने परिवार को उस 'काल' से बचाने का प्रयास करती। उन पांच दिनों में हर पल चौकन्नी रहती अपने ही घर में छिपती-बचती दिन भर बच्चों को लेकर पलंग पर ही बैठी रहती। मेरे पति और देवर मेरी बातों का विश्वास नही करते थे। पांच िदन मे मुझे कई बार डांट पड़ी। झूठी भी कहा गया। डरपोक और शक्की का खिताब भी दिया गया। 
खैर अब पूरी घटना बताती हूँ। 
उस दिन धनतेरस का दिन था। मैं रोज सुबह जल्दी ही जाग जाती थी। उस दिन भी जल्दी जाग कर पूजा की तैयारी करनी थी। 
सुबह जब बाथरूम मे गई तब थोड़ा अंधेरा ही था।  
मै नहा कर आ गई,पूजा की अौर नाश्ता बना कर बच्चों को जगाई, छोटे बेटे को गोद मे लेकर बाथरूम मे गई, वहां का नजारा देखते ही मेरे होश उड़ गए। बहुत बड़ा काले रंग का नाग अपने रौद्र रूप मे बैठा था। मै डरी हुई भाग कर सबको बताई कि बाथरूम में काला नाग बैठा है। 
दोनो भाई दौड़े और बाथरूम में देख कर आए, बोले वहां तो कुछ भी नही। मुझे डांट कर वो लोग नहा धो कर तैयार हुए और अाॅफिस चले गए। 
मैं डरी हुई थी। बच्चों को पड़ोसी के घर के बाथरूम मे ले गई। शाम को जब इन्हे पता चला कि मैं और बच्चे पड़ोसी का बाथरूम इस्तेमाल कर रहे हैं, तब खूब डांट पड़ी। 
लेकिन मै अपने घर का बाथरूम इस्तेमाल करने को तैयार नही थी। बच्चों को भी नही जाने देती। ये और देवर रोज उसी बाथरूम में जाते। दीवाली के दिन हिम्मत कर के मै जब अपने घर के बाथरूम मे गई तब फिर नाग कोने मे ही बैठा था। मैं भाग कर आई और रोने लगी। 
ये जाकर देखे और मुझे ना जाने क्या-क्या बोले। शाम को मैं जैसे-तैसे पूजा की, पर डर तो लग ही रहा था। पड़ोस की भाभी जी अच्छी थी, मेरी बात पर विश्वास करके अपना बाथरूम इस्तेमाल करने देती थी। 
दीवाली के दूसरे दिन भी नाग सिर्फ मुझे ही दिखा और उस दिन भी मुझे डांट पड़ी।
भाईदूज के दिन मै बोली...यदि  आप लोगों को मुझ पर विश्वास नही और पड़ोसी के बाथरूम को इस्तेमाल करने पर एतराज है...तो बच्चों को खुद नहला कर तैयार करें..!
ये मेरी बात मान गए और बेटे को लेकर बाथरूम मे गए, अगले ही पल वापस आकर बोले ...अरे सच मे बहुत 'बड़ा 'है, इतना बड़ा कि उसे मारना अपने 'बस' की बात नही.!
अब हथियार की तलाश शुरू हुई, आस-पास के लोग आ गये। बहुत मेहनत करके उसे मारा गया। 
'वो' 'पांच दिन' से हमारे घर में था। सिर्फ मुझे डराता था। सबने कहा कि नाग की पूजा करो, ईश्वर को धन्यवाद कहो, घर में पांच दिन तक रहने के बावजूद उसने हमें कोई नुकसान नही पहुंचाया। हमने नारियल और अगरबत्ती से शंकर जी की पूजा किये और 'जान बची तो लाखों पाए' मंत्र का जाप किए।
शायद 'उसे' मुक्ती चाहिए थी। जो भी हो 'वो पांच दिन' भयानक थे, कष्टदाई भी। 

शनिवार, 19 अप्रैल 2014


                 पहचान

पहचान पत्र का होना िकतना जरूरी है,
मुझे जब पता चला तब मेरी कोई पहचान नही थी।
१३ सितम्बर २००६ के बाद जब मुझसे मेरा परिचय पूछा गया,
तब मै समझ नही पाई कि ऐसा क्यों पूछा जा रहा है?
सबसे पहले बैंक आॅफ इंडिया वालों ने ही मुझे पहचानने से इन्कार किया।
बैंक मे मैं अपना परिचय 'श्री आर के वर्मा' की पत्नी के रूप मे बताई थी।
परंतु बैंक अधिकारी ने इसका प्रमाणपत्र मांगा,जो मेरे पास नही था।
बैंक अधिकारी ने साफ तौर पर कहा......,
'यदि आपके पास 'श्री आर के वर्मा' की पत्नी  होने का प्रमाण पत्र नही है तो मैं आपको नही पहचानता'।
उस दिन बात मेरी समझ मे नही आ रही थी,
अधिकारी की बात सुन कर मै चकित थी,सोच मे थी, मै कौन हूं?
मेरे पास स्थाई पता नही था। यानि मेरा कोई घर नही।
मेरी शादी का कार्ड मान्य नही था।
राशन कार्ड या लाइसेन्स जैसी कोई चीज नही थी।
किसी बैंक मे कोई खाता नही।
कई शपथ पत्र बनवाने के बाद बैंक मे खाता खुला।
फिर पासपोर्ट के लिए अर्जी दी। वहां भी सत्यापन पत्र देना पड़ा।
पासपोर्ट आॅफिस मे मेरा नाम 'शबनम' होने के कारण मेरे धर्म पर प्रश्न किया।
तब मेरे माथे पर बिन्दी का ना होना मेरे 'हिन्दु' होने पर भी एक प्रश्न था।
कई पड़ाव पार करने के बाद मेरा पहला पहचानपत्र पासपोर्ट के रूप मे बना।
जिसे दिखा कर मै अपने होने का एहसास दिला सकती हूं।
इन सब कार्य की पुष्टी होने मे पुरे दो साल लगे।
दो साल तक बिना किसी पहचान के रहना और बैंक मे मेरे प्रति कार्यवाही होना,
प्रति पल एहसास दिलाता था, मै कौन हूँ?
मै अपने महान देश मे अपनी पहचान के साथ एक  नागरिक हूं।

                                                                            --शबनम वर्मा--


Shabnam Verma
Bangalore

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

दान

            दान

दानो मे महा दान होता है कन्यादान,
गुप्तदान की अपनी ही माया है !!

शनि के प्रकोप से बचाता है छाया दान,
स्वर्ग पहुचने के लिए गौ दान !!

मंदिरों की दान पेटी मे श्रद्धा दान,
अन्न दान  से भर जाता है भंडार !!

वस्त्र दान करने से मिल जाती संपन्नता,
जल दान दिलाती मुक्ती !!

स्वर्ण दान से प्राप्त हो ऐश्वर्य,
'मत'दान से बड़ा न कोई दान !!



शबनम वर्मा

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

मेरा नाम

मेरा नाम 
एक बार मैं अपनी आँखे जाँच करवाने डाक्टर के पास गयी.वहां मेरा नाम पूछा गया.मैंने अपना नाम बताया "शबनम वर्मा "थोड़ी देर लाईन में बैठी,
फिर जब मेरा नाम पुकारा गया.मैं "आई मशीन "के सामने बैठी,एक डाक्टर आये और मुझे एक चश्मा पहना कर सामने देखने को कहा,
मैं सामने देखने लगी वहां उर्दू में कुछ लिखा हुआ था,मुझे कुछ समझ में नहीं आया.
थोड़ी देर चुप बैठी रही शायद हिंदी में कुछ लगेगा तब पढना हो,परन्तु  डाक्टर ने  फिर से उसी को पढने के लिए कहा,
तब मैं ने कहा,'मुझे कुछ समझ में नही आ रहा है ".डाक्टर ने कहा "आपकी आँखें बहुत ज्यादा ख़राब हैं"मैंने डाक्टर को घुर कर पूछा "क्या'?
वह बोला इतने बड़े अक्षर आपको नहीं दिख रहा है,तब मै ने कहा," मुझे उर्दू नहीं आती, आपने हिंदी या अंग्रेजी का कैलेंडर क्यों नहीं लगाया?
उसने कहा आपका नाम " शबनम" है न?
अब मैं सारी बात समझ गई थी और हंस रही थी,तभी आर .के .वर्मा जी भी वहां आ गये और खूब जोर-जोर से हंसने लगे.
यह घटना जून २००५ की है. मेरे साथ ऐसा बहुत बार हुआ है,क्योकि मेरा नाम 'शबनम" है.
शबनम वर्मा ........................................

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

अजीब बात

अजीब बात
आज एक बड़ी अजीब बात हुई.हुआ ये कि नई वाली 'सिंगर सिलाई मशीन' जाम हो गई थी,
हम लोग उसे ठीक करवाने उसके दुकान गए. वहाँ पर मशीन को छोड़ कर हम लोग टोटल गए, सामान लेने ,क्योंकि मशीन वाले ने कहा ,'शाम को देंगे'.
हम लोग आराम से सामान खरीद कर घर आये ,और फिर उसे फोन किये तो उसने कहा मशीन  ठीक हो गई है,आप ले जाओ. हम लोग वहाँ गए , 
मशीन तो ठीक हो गई थी. पर उसने उसका एक 'फूट प्रेशर' जो लगा हुआ था, उसे निकाल लिया और बोला 'ये हमारा है' ,मैं बोली,' इसमें जो लगा हुआ था,वो कहाँ है?
उसने कहा,'आपने लगाकर नहीं लाई'.मुझे बहुत आश्चर्य हुआ.मैं क्यों निकालूंगी?पर वो मेरी बात नहीं माना.बार बार यही कहता रहा 'आप के घर में ही है, मै बोली यदि नहीं मिला तो फिर इतनी दूर  आना  पडेगा वो बोला ,'नहीं आना  पड़ेगा, आपके  घर में ही है' .मैं उससे मशीन की सुई  और रील खरीदी  और उसे पैसे देने लगी तब वहाँ पर टेबल के कांच में साईं बाबा की फोटो थी, मैं एक मिनट देखी और सोचने लगी,पता नहीं कहाँ गया ?मिलेगा या नहीं?  
शिशिर ने कहा ,'चलो घर में ढूंढ़ लेते हैं, फिर यदि नहीं मिला तो दूसरा खरीद दूंगा.मैं उससे उसकी कीमत पूछी तो ११०/ का बताया .
मैं पुरे रास्ते सोचती रही, मैं तो निकाली नही और उसने भी नहीं रखा, तो कहाँ गया?
यही सोच कर मन खराब लग रहा था , हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ होता है .
दिन भर के बाहर थे तो थक भी गई थी और ये टेशन ,तब तक अपने घर कि पार्किंग भी आगई,
जैसे हीं गाड़ी से नीचे उतरे शिशिर के पैर के पास वो 'फूट प्रेशर'  दिखा ,उसने उठाया, और मुझे दिखाया, और पूछा ये तो नहीं?मैं हैरान थी,'यहाँ कैसे आया' ? 
पूरे दिन यहाँ कैसे पड़ा रहा ?अभी भी मुझे यही लग रहा है, ऐसा कैसे हुआ?वो या तो घर में होता या दूकान में ,पार्किंग में तो गिरने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि मैं मशीन को  कई दिनों से एक झोला में रखी थी और झोला सीधे दुकान में ही खुला ,फिर झोला को मै अपने पर्स में रखी थी, जो घर आने के बाद भी नहीं निकाली. 
दुबारा भी जब दूकान पहुची तब झोला निकाली और जब दुकान वाले ने कहा ,'फूट प्रेशर' मशीन में नहीं है, तो वहाँ पर झोला  खूब उलट पलट कर भी देखी .
पर वहाँ पर नहीं मिला .और जब यहाँ मिला,मैं हैरान रह गई ,ऐसा कैसे हुआ?झोला को भी खूब अच्छे से देखी ,कहीं फटा हुआ तो नहीं?
पर वो तो कहीं से भी नहीं फटा था.पर वो मिल गया बस यही अच्छा हुआ .
अब मन ठीक है. है न अजीब बात?
शबनम वर्मा ..............................
..............................................................................

रविवार, 30 मार्च 2014

Fwd: samay



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From: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>
Date: Sunday, May 26, 2013
Subject: samay
To: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>




---------- Forwarded message ----------
From: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>
Date: 2012/4/5
Subject: samay
To: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>


समय कभी रुकता नहीं,
जीवन चलते रहने
का ही नाम है ,
लेकिन कभी कभी
समय रुक जाता है,
जब समय रुक जाता है
तो किसी भी समय का इंतजार नहीं होता
कब दिन निकला कब,रात हुई?
क्या खाया ,क्या पहना?
कुछ याद नहीं होता,
हाँ एक आने वाली तारीख याद होती है
और उसी इंतजार में वो रुका हुआ समय भी अच्छा लगने लगता है
इसी रुके हुए समय में हम अपनी पिछली बातों को भी याद करते हैं,
कभी खुश होते हैं तो कभी दुखी,
परन्तु जब समय रुक जाता है तो सुख दुःख का एहसास भी नहीं होता.
शबनम .................................................................................




Fwd: मोह



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From: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>
Date: Sunday, March 30, 2014
Subject: मोह
To: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>


                                                  मोह
छोटे से गाँव मे एक किसान अपनी पत्नी एवं बेटा-बहू के साथ रहता था।खेती करते हुए अपने परिवार के साथ खुश था।एक दिन साधारण सी बीमारी मे ही किसान की पत्नी का निधन हो गया। किसान और बेटा-बहू  दु:खी हो गए । दु:ख के कारण कुछ ही दिनो के बाद किसान भी चल बसा।बेटा बहू अपनी खेती बाड़ी मे लग कर अपनी गृहस्थी की गाड़ी पूर्ववत ् चलाने लगे।एक दिन किसान का बेटा जब खेत से लौट रहा था तब रास्ते मे एक कुत्ते का पिल्ला दिखा उसने उसे गोद मे उठाया और अपने घर ले आया।कुत्ता घर मे पलने लगा।कुछ दिनों के बाद किसान के घर गाय ने एक प्यारी सी बछड़ी को जन्म दिया।कुत्ता बछड़ी को देख कर बहुत खुश हुआ।जब रात को  सब सो गए तब कुत्ता बछड़ी से पुछा ... तुम मुझे  पहचानती हो?बछड़ी ने सिर हिला कर हां कहा।फिर बछड़ी ने कुत्ते से पुछा ....तुम यहां? कुत्ते ने जवाब दिया... हां जब तुम चली गई तब मेरा मन नही लगा और मैं भी चला गया।लेकिन बेटे -बहू का मोह खत्म नही हुआ था सो कुत्ता बना कर ईश्वर ने वापस इसी घर में भेज दिया।अरे हां अब तुम बताओ ,तुम भी तो यहीं आ गई?
बछड़ी बोली...हां मेरा मन कहीं और नही लग सकता था सो ईश्वर ने मुझे भी यहीं भेज दिया।अब कुत्ता घर की रखवाली करता,बछड़ी अपनी आंखों से अपने बेटे बहू को निहारती उनके बच्चों के साथ खेलती।बहुत दिन बीत गए ।बछड़ी अब बड़ी हो गई थी।कुत्ता भी बड़ा हो गया था।दोनोअपने पिछले जनम को याद करते और इस जनम को सराहते कि हम अपने ही बच्चों के काम आ रहे हैं।गाय को प्रथम रोटी और कुत्ते को अंतिम रोटी प्रतिदिन मिलती ,दोनो चाव से खाते ,खुश रहते।एक दिन गाय को एक दूसरी गाय ने सींग मारी गाय घायल हो गयी।कुत्ता यह देख दु:खी हुआ।फिर एक दिन गाय मर गई।कुत्ता दु:खी रहने लगा ।किसान के बेटा बहू भी उदास रहने लगे।एक दिन कुत्ा भी मर गया।कुछ दिन और बीते।फिर एक दिन जब किसान का बेटा अपने खेत में हल चला रहा था और उसके बच्चे वहीं खेल रहे थे,बच्चों ने देखा एक गोबरैला खेत मे चल रहा है ,बच्चों ने गोबरैला को मारना चाहा ,बच्चों की मां ने गोबरैले को मारने से मना किया,उसने अपने बच्चों को बताया कि कैसे गोबरैला खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाता है।गोबरैला सारी बातें सुन रहा था और खुश हो रहा था,तभी गोबरैले को एक केंचुआ दिखी,गौबरैला बहुत खुश हुआ।उसने केंचुए से पूछा ़़़..... तुम? केंचुआ बोली .... हां मैं! देखो हम दोनो मिल कर अपने बच्चों की कुछ तो मदद कर ही रहै हैं।गोबरैला बोला ....लेकिन हम कब तक इस जीवन चक्र मे फंसे रहेंगे?
केंचुआ बोली ..... जब तक हम अपना मोह नही त्यागेंगे! ू
गोबरैला बोला ... मोह कोई वस्तु नही जिसे छोड़ा जा सके,यदि सभी मोह त्याग दें तो इस सृष्टी का क्या होगा?जो जैसा चल रहा है चलने दो,
हम फिर मिलेंगे अपने ही बच्चों के आस - पास  किसी और रूप में।


Shabnam Verma
Bangalore