रविवार, 26 मई 2013

बुलबुल

आज एक बुलबुल की कहानी लिख रही हूँ.
यह कहानी किसी किताब में नहीं पढ़ी,यह कहानी उस बुलबुल की है जो हमारे ही बगीचे में रहती थी .
मुझे बागवानी का बेहद शौक था,अपने आंगन में गुलाब और गेंदा के बहुत से पौधे लगाई थी.
हर दिन बगीचे की देख भाल करती,सभी पौधे बड़े हो रहे थे,कुछ में फूल भी आने लगे,देख कर बहुत ख़ुशी होती थी.
गेंदा का पौधा भी बहुत बड़ा हो गया था और खूब फूल खिले थे.एक दिन हमने देखा,एक बुलबुल का जोड़ा हमारे बगीचे में बार बार आ-जा रहा है,मुझे लगा पौधों में कुछ खाना ढूंड रही होगी,एक दिन फिर बगीचे की सिचाई करते वक्त मेरा ध्यान दोनों बुलबुल की तरफ गया जो गेंदे के पेड़ में (हाँ अब वह एक बड़ा पेड़ बन गया था और उसमे करीब साठ-सत्तर फूल एक साथ लगे थे )बार-बार जा रही थी.
मैं थोड़ी देर वही खड़ी रही और बुलबुल को ध्यान से देखने लगी,दोनों बुलबुल एक-एक तिनका लाती और गेंदे के अंदर जाती.
मैं समझ गई कि वह घोसला बना रही है,बच्चों ने भी देखा.मेरे दोनों बेटों के लिए यह एक नई बात थी.
मैंने बच्चों को समझाया,तंग नहीं करना;" वह अपना घोसला बना रही है",
बच्चे स्कूल जाते और आते समय बड़े ध्यान से गेंदे के पेड़ को देखते,एक दिन  शिशिर ने बताया," माँ बुलबुल के घोसले में तीन छोटे-छोटे अंडे हैं,मै बगीचे में गई,देखी तो सच में बहुत सुन्दर घोसला बना हुआ था और उसमे तीन अंडे थे.बुलबुल गेट पर बैठी थी,शायद कुछ खाना के जुगाड़ में बाहर गई थी,मै अंदर जाकर थोड़े से गेंहू के दाने ले आई और आँगन में एक जगह रख दी,मैं और शिशिर अन्दर से  देखने लगे बुलबुल समझ गई थी कि दाना उसी के लिए है,वह दाना चुगने लगी.शिशिर एक कटोरे में पानी ला कर रख दिया.बस अब हम लोग प्रति दिन बुलबुल को देखते.बुलबुल भी हमे पहचानने लगी थी या अपने अंडे कि रखवाली के लिए ही आसपास रहती थी.जो भी हो,हम भी पुरे समय ध्यान रखते कि कहीं बिल्ली कि नजर न पड़े.करीब दो सप्ताह इसी तरह बीत गए,शरत और वर्मा जी का ध्यान इस तरफ नहीं था.
वेर्मा जी तो तब बलकवाडा में रहते थे.सन्डे को ही खरगोन आते थे.शरत अपनी पढ़ाई में व्यस्त था.
फिर एक दिन जब मै बगीचे में सफाई कर रही थी,मुझे चीं चीं कि आवाज सुनाई पड़ी,मैं धीरे से घोसले में झांक कर देखी,लाल-लाल छोटे-छोटे  बुलबुल के बच्चे थे.
शाम को शिशिर स्कूल से आते ही जब बुलबुल के बच्चों को देखा तो बहुत खुश हुआ.
अब दोनों बुलबुल अपने तीन बच्चों के लिए आहार जुटाने में व्यस्त थे.बारी-बारी से दोनों अपनी चोंच में कुछ लाते और नन्हे-नन्हे बच्चों के मुह में डालते.
बच्चे भी अपने माता पिता की ओर देखते हुए चीं चीं करते,हमारे बगीचे की रौनक खूब बढ़ गई थी.मेरा पूरा ध्यान बस बगीचे में ही रहता.खास करके बुलबुल के घोसले पर.शिशिर ने एक फोटो भी खीच लिया.
काफी दिन बीत गए.थोड़ी ठण्ड पड़ने लगी थी.मैं और शरत,शिशिर धूप में बैठे थे.मैं अपनी बुनाई में लगी थी,तभी शिशिर ने कहा"माँ देखो अब बुलबुल के बच्चे बड़े हो गए,तभी एक बड़ी बुलबुल आई,घोसले में बैठ गयी,छोटी बुलबुल घोसले से बाहर निकल कर गेट पर जा बैठी,फिर दुसरे और तीसरे बच्चे भी गेट पर जा बैठे,बड़ी बुलबुल भी घोसले से बाहर निकल कर सामने वाले माकन की छत पर जा कर बैठ गयी.तीनों बच्चे अब अलग-अलग दिशा में उड़ चले.
कई दिनों तक मै बुलबुल कि राह देखती रही,शायद फिर से बुलबुल अपने घोसले में आएगी ;
पर नहीं आई.यह सारी बातें जब वर्मा जी को बताई तो उन्होंने कहा "अब बुलबुल यहाँ नही आएगी वह तो और कहीं अपना आशियाना बनाएगी.
बुलबुल कि याद के लिए मै उसके घोसले को कई दिनों तक सम्हाल कर रखी रही थी.
गेंदे का पेड़ भी अब सूखने लगा था.अब बस मेरे मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी,


"हमारा जीवन भी बुलबुल जैसा ही तो है,हम भी तो अपने बच्चों को अपना एक आशियाना बनाने के लिए सब कुछ सिखाते हैं.
यही सच है . 

शबनम वर्मा

यादे

आज फिर बीते हुए कुछ पल याद आ गए।
बीते हुए समय यादों में जीवित रहते हैं।
उसे चाह कर भी वर्तमान से नहीं जोड़ा जा सकता।
जब हम छिन्दवाड़ा में खेत वाले घर में रहते थे।
वहां परेशानियों कि तो कोई कमी नहीं थी,फिर भी सभी खूब जोर से हँसते थे।
परेशानियों के बावजूद भी यदि इन्सान खुश रहे,इसे जिन्दादिली ही कहेंगे।
क्या खाए?क्या पहने?इन बातों से हट कर,सब एक दुसरे के सुख दुःख में शामिल रहते थे।
उन्ही दिनों कि बात है,१९८७ फरवरी में एक दिन खूब बारिश हुई और खूब ओले भी गिरे थे।
इतने ओले मैंने पहली बार ह़ी देखे थे।
पूरा खेत बर्फ से ढक चुका था,खपड़े वाले छत टूट गए,सारे ओले और पानी घर
के अन्दर आने लगे।
परिवार के सारे सदस्य एकसाथ एक ह़ी जगह इकट्ठे हो कर ईश्वर को याद करने लगे।
कच्चा घर होने के कारण घर के अन्दर भी कीचड़ हो गया था,
वहां से कही भी जाने के लिए कोई रास्ता भी नहीं,घर के चारों तरफ खेत था
और वह ओले से ढका हुआ था,मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
दादी ने मुझसे आग जलाने के लिए कहा,मै एक बड़े से तसले में लकड़ी और कंडे
रख कर आग जलाने कि कोशिश करने लगी।
परन्तु अग्नि देव का तो कहीं नामों-निशान भी नहीं था।सब कुछ तो गीला और
ठंडा हो चुका था।
हम सब लोग मिल कर,रुई,कपडा,कपूर,और मिट्टी का तेल डाल कर किसी तरह आग
जलाने की  भरपूर कोशिश में जुट कर सारी चिताओं से मुक्त थे।
कोई पंखा हिला रहा था,तो कोई फुकनी से फूंक रहा था,
पूरे घर में धुंआ ह़ीधुंआ हो गया।
काफी देर के बाद अग्नि देव प्रसन्न हुए,हम लोगों कि ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
आग कि गर्मी में सब अपने हाथ सेंकने लगे।
तब तक बारिश बंद हो चुकी थी,हाँ बर्फ सारे खेत में फैली हुई थी।
चारों तरफ कि धरती एकदम सफेद,
इस एक घटना से ह़ी मुझे समझ में आ गया कि
'गांव के लोगों का जीवन कितना कठिन है ?
उस वक्त किसी को भूख नहीं लगी,किसी को नींद भी नहीं आई,सब एक साथ आग
जलाने कि कोशिश में जुटे रहे।
जब आग जली तब ऐसा लगा जैसे अब कोई परेशानी नहीं।
सच में ऐसा ह़ी हुआ,धीरे-धीरे सब अपने-अपने कमरों कि सफाई में लग गए,
दिन से रात हो गई।
किसी तरह सबने मिल कर कुछ खाने का भी इंतजाम किया,
बच्चों को खाना,दूधखिला-पिला कर सुला दिए।
हम सभी लोग किस्से कहानियाँ सुनते हुए सुबह का इंतजार करने लगे।
दादी खूब अच्छी-अच्छी कहानी सुना रही थी।
आज सोचती हूँ "वह भी क्या दिन थे ?
बिना साधन के कठिनाईयों से लड़ कर खुश रहते थे। 
यही है जिन्दगी 

शबनम वर्मा ...
बंगलौर ...

छोटी-छोटी बातें

सब कहते हैं कि उम्र के साथ जानकारी भी बढती है, पर क्या यह सच नहीं है,कि बड़े होने के बाद बहुत सी बातें जो हमें किताबों और अपने बड़ों या अपने गुरु से नहीं पता चली, वो छोटी या बड़ी बातें आज हमें अपने ही बच्चों से या अपने से छोटों से सिखने का मौका मिल रहा है, इसी सन्दर्भ में अपना अनुभव लिख रही हूँ.

"रामायण और महाभारत" कि "कथाएँ" बचपन से ही सुनती आ रही हूँ, और जब थोड़ी बड़ी हुई तब पता चला कि " त्रेता युग और द्वापर" युग कि निशानियाँ अभी भी मौजूद है, जैसे "भगवान राम-सीता"के पद चिन्ह,या "श्री कृष्ण" के " पद चिन्ह" और भी कई" युग पुरुष"  कि निशानियाँ. बचपन में एक सवाल मन में उठा कि"पद चिन्ह"तो मिट सकते हैं, फिर कैसे अभी तक मौजूद है?
फिर एक सवाल मन में आया कि क्या" रामजी "के या सभी "युग पुरुष "के हाथ पैर इतने कठोर थे,कि निशान बन जाते थे?

तब यह सवाल मैं अपनी" दादी और नानी" से पूछी, पर उन्होंने "भगवान कि लीला अपरम्पार" कह दिया. फिर यही सवाल जब अपनी" माँ और बाबूजी" से पूछी तो उन्होंने भी ये कह कर टाल दिए कि तब"सतयुग"था और सब"ईश्वर"कि"लीला"थी. परन्तु मेरा सवाल वहीँ के वहीँ था. फिर कई साल के बाद मेरे"बच्चों"ने भी"यही सवाल"मुझसे भी पूछा,जब टीवी पर"रामायण और महाभारत"जैसी धार्मिक-धारावाहिक प्रसारित होने लगा, मैं भी उन्हें वही सब बताई जो मुझे बताया गया था. समय बीता बच्चे बड़े हुए स्कूल और कॉलेज कि पढ़ाई पूरी कर लिए पर मेरे मन में वही सवाल आज भी थे. और जो जवाब मुझे बताया गया था,मै उससे संतुस्ट नहीं थी।

फिर एक दिन टीवी पर वही सब प्रसारित हो रहा था, और उसमे बता रहे थे "राम और सीता के पद चिन्हों" के बारे में,तब टीवी देखते-देखते ही मै अपने छोटे बेटे से इन बातों का जिक्र करने लगी और"मैं बोली कि कुछ भी बताते हैं,ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि पदचिन्ह अभी तक हों क्या "रामजी और सीताजी" के पैर इतने कठोर थे? मेरी बात सुनते ही बेटे ने जवाब दिया, " पैर कठोर नहीं थे, माँ "धरती नर्म" थी. यह जवाब मुझे एकदम "सही" लगा, मै आश्चर्य चकित होकर बेटे से बोली, आज वर्षों बाद मुझे सही जवाब मिला, वह भी मेरे बेटे से, मैं तो धन्य हो गई.
 
वर्षों से जो सवाल मेरे मन में चल रहा था,उसका जवाब इतने"छोटे शब्दों"में पूरी ऐतिहासिक घटना एकदम साफ हो गई.

शबनम

दूधवाला

हम सेंधवा में रहते थे तब कि एक घटना लिख रही हू.बात तो बिलकुल ही साधारण है .फिर भी मेरे लिए कुछ खास है क्योंकि ऐसा फिर कभी नहीं हुआ .
बात यह थी कि हम लोग जहाँ रहते थे वह एक बहुत छोटा सा गाँव था जिसका नाम मेहत गाँव था.
वर्मा जी कि पोस्टिंग वही  के बी.ओ.आई.शाखा में थी .
सब कुछ ठीक था बस पानी बहुत महंगा था .खैर तब भी काम चल ही जाता था .
हमारे दोनों बेटे बहुत छोटे थे .
गाँव का ही एक दूध वाला दूध दे जाता था .उसका नाम बद्री था .एक दिन मैं वर्मा जी से बोली कि आजकल बद्री दूध में बहुत पानी मिलाने लगा है .
उन्होंने कहा ठीक है उसे एक बार समझा देना .दुसरे दिन जब बद्री दूध लेकर आया तो मैंने उससे कहा "क्यों बद्री आजकल दूध में पानी बहुत मिला रहे हो?
उसने बताया, गाय का चारा बहुत महंगा हो गया है .मैं पूछी  "कितने का चारा रोज खिलाते हो" ?
उसने बताया ," दो रूपए" का .मै बोली ठीक है ,तुम हमें दो रूपये महंगा दूध देना ,क्यों कि पानी तो घास से ज्यादा महंगा है,पानी मिलाना ठीक नहीं ,
आखिर तुम भी तो पानी बहुत दूर से भर कर लाते हो ?
गाँव का सीधा सादा आदमी  मेरी बात बखूबी समझ गया और फिर कभी दूध में पानी नहीं मिलाता था
शहर के दूध वाले शायद इतनी आसानी से मेरी शिकायत को नहीं समझ पाते.और न ही पानी मिलाने का कारन ही बताते .
आज भी मुझे उस छोटे से गाँव के अति साधारण  लोगों कि याद आती तो आश्चर्य होता है.



शबनम वर्मा 
बंगलौर ......

एक सफर ऐसा भी

हर इंसान के जीवन में कुछ ना कुछ ऐसा अवश्य घटित होता है जिसे वह चाह कर भी नहीं भूल पाता. मैं भी अपने जीवन की कई ऐसी घटनाओं को नहीं भूल पाती,जो अनायास ही घटित हुआ. आज इसी सन्दर्भ में एक ऐसी घटना का जिक्र कर रही हूँ,जिसे बहुत चाह कर भी भूलना नामुमकिन है.  

बात मई१९८६ की है,एक दिन रवि अचानक बैंक से आ कर मुझे  बताये कि हमे अभी छिन्दवाडा जाना है.मैं बिना कोई सवाल किये तैयारी करने लगी. तब शरत मात्र छः माह का था और बड़वाह की भीषण गर्मी.मैं जल्दी-जल्दी एक छोटा सूटकेस और एक बैग पैक कर ली. सिर्फ आधे घंटे में हम घर के बाहर थे. हम इंदौर से खंडवा वाली सड़क पर 'बैंक ऑफ़ इंडिया' के सामने खड़े थे.रवि काफी तनाव में थे ,मेरी हिम्मत नहीं हुई उनसे कुछ पूछने की. तभी एक ट्रक हमारे सामने आ कर रुका.मैं कुछ समझ पाती,इसके पहले हीं सामान ट्रक पर रखा जा चुका था,शरत को मेरी गोद से लेकर रवि ट्रक पर बैठ गए थे. ऊपर से ही हाथ बढ़ा कर मुझे भी ट्रक की अगली सीट पर बैठा लिए.यह सब इतना जल्दी हुआ की मैं कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थी. खैर,जब आराम से बैठी तब रवि ने बताया कि छिंदवाडा से तार आया है,पिताजी की हालत नाजुक है,इसी लिए हमे तुरंत आने को कहा है.अब मेरी समझ में कुछ-कुछ आने लगा, परन्तु अभी भी मुझे यकीन नहीं हो रहा था,कि हम ट्रक से छिंदवाडा जा रहे हैं.
 
मैं चुपचाप शरत को गोद में लिए बैठी थी.ट्रक चलने लगा.करीब दो घंटे के बाद खंडवा पहुँच कर एक ढाबे के पास ट्रक रुका. ड्राइवर और खलासी वहाँ उतर कर नहाना-धोना करने लगे. हमलोग ट्रक में ही बैठे रहे कि शायद वो लोग जल्दी हीं आकर चलेंगे. पर ड्राइवर तो खा कर एक खाट के ऊपर सो गया. काफी देर के बाद रवि नीचे उतरे और कुछ खाने के लिए लेकर आये. मैं थर्मस में से गरम पानी निकाल कर शरत के लिए सेरलक बनाई और उसे खिला कर थपकी देने लगी,गर्मी इतनी थी कि नन्हे से बच्चे को समझाना कठिन था.पर हमारे पास और कोई साधन नहीं था.हम कुछ नहीं कर सकते थे.लगभग तीन  घंटे के बाद ड्राइवर और खलासी वापस आये और बोले " चलते हैं साहब, आपने कुछ चाय नाश्ता किये?इन्होंने'हाँ',कहा.फिर ट्रक चल पडा,अब हमें थोड़ी तसल्ली हुई की अब जल्दी ही छिंदवाडा भी पहुँच जायेंग.लेकिन दो घंटे के बाद ही 'ईटारसी' के पास आकर ड्राइवर को नींद आने लगी,उसने ट्रक एक ढाबे के पास फिर रोक दिया. ड्राइवर बोला'मुझे नींद आ रही है'अब थोड़ा सो जाता हूँ,आप लोग भी आराम से बैठिये.वो ढाबे में पड़ी चारपाई पर सो गया. खलासी भी दूसरी चारपाई पर सो गया. अब इन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा,रात को सुनसान रास्ते में ट्रक पर हम छोटे से बच्चे के साथ हैं,मैं तो डर के कारण एक भी शब्द नहीं बोल पाई,बस कभी सामने देखती तो कभी इन्हें और कभी अपने नन्हे से बेटे को.

लगभग पांच बजे सुबह ड्राइवर और खलासी उठे,अपने'दैनिक कार्य'से निवृत हो कर चाय पीते  हुए आकर ट्रक पर सवार हुए. फिर एक बार इनसे बोले "साहब आप भी चाय पी लो".ये नीचे उतरे और दो कप चाय ले कर आये .चाय पी कर हमारा सफर एक बार फिर शुरू हो गया . तामिया पिपरिया होते हुए दिन के करीब दस बजे हम छिंदवाड़ा पहुंचे.ट्रक वाले ने हमे मेन रोड पर उतार दिया. वहाँ से अब हम रिक्शे पर बैठे और घर के लिए चले.घर के थोड़े पहले ही हमे रिक्शा भी छोड़ना होता था,क्योंकि हमारा घर खेत पर है. अब हम पैदल ही चल कर घर पहुंचे.घर के बाहर ही सब लोग मिल गए और आश्चर्य-चकित हमे देखने लगे.अचानक हमे देख कर सब खुश भी हुए .
 
अन्दर जाकर पता चला, "पिताजी" ठीक हैं, "ताऊजी" बीमार हैं.असल में ये लोग "ताऊजी" को "बाप" कहते थे, और "तार" में लिखा था "फ़ादर सीरियस ".खैर हम उनसे मिले, उनकी बीमारी हालत देख हमे अच्छा नहीं लगा.ताऊजी हमसे मिल कर बहुत खुश हुए.थोड़ी देर सबसे  मिलने के बाद हम दोनों 'माँ 'के चौके में गए, वहाँ 'पिताजी' शरत को गोद में लिए उसके साथ खेल रहे थे. हम भी वही जमीन पर ही बैठ गए, माँ ने हमें चाय दी,और मुझसे धीरे से पूछी,'कितने बजे' की ट्रेन थी? मैं बोली "ट्रेन से नहीं ,हम ट्रक से" आये हैं. इतना सुनते ही पिताजी इनसे बोले " रवि जरा हमारे साथ चलो", और वो दोनों बाहर निकल गए. अब माँ ने मुझे डांटना शुरू किया ,कहने लगी "तुम्हे कुछ समझ में नहीं आता? इतने छोटे बच्चे को लेकर इस गर्मी में ट्रक से इतना लंबा सफर की? मैं उन्हें समझाने की कोशिश में  बोली "माँ मुझे तो पता भी नहीं था,हम कैसे और क्यों जा रहे हैं,"इन्होंने कहा,'जाना जरुरी है'.ट्रक में बैठने के बाद ही बताये "पिताजी की तबियत ठीक नहीं है". माँ ने कहा ' ठीक है, तुम शरत को नहला दो और तुम भी तैयार हो जाओ, 'खाना खा कर थोड़ा आराम करो, फिर बात करते हैं. मैं भी जल्दी से अपने काम में लग गई .लगभग एक घंटे के बाद ये आये और अपने कपड़े मांगने लगे,मैं कमरे में जाकर बैग से कपड़े निकाल कर इन्हें दी, तभी इन्होने मुझे धीरे से डांटे और बोले " माँ-पिताजी" को ट्रक वाली बात क्यों बताई? मैं  बोली "आपने तो नहीं बताने की कोई बात मुझे नहीं बोले",मुझे क्या पता ये नहीं बताना है"? पर इनका गुस्सा तो अब कम नहीं होने वाला था, बोले 'आज ही शाम' की बस से हमें वापस भी जाना है,सामान पैक ही रखना. मैं समझ गई "पिताजी ने इन्हें खूब डांटे हैं". हम उसी शाम बस से वापस बड़वाह के लिए निकल गए .
 
पूरे चौबीस घंटे के बाद हम 'बडवाह' के अपने घर पहुचे. वहाँ "ताऊजी " के गुजर जाने की खबर वाला "तार" हमारा इन्तजार कर रहा था, जैसे ही हमने ये खबर पढ़े,मन  में दुःख के साथ एक सुकून-सा हुआ की 'अच्छा ही हुआ जा कर उन्हें मिल आये'.अब चाहे जैसे भी गए.  

इस घटना को घटे कई साल हो गए,पर मैं कभी इसे भूल नहीं पाती.
 
शबनम वर्मा
बेंगलुरु

रविवार, 5 मई 2013

आशियाना


तिनका तिनका जोड़ कर ...
आशियाना बनाना आसान नहीं 
जब तिनका ही न मिले तो जोड़े किसे 
तिनका मिले कहाँ से 
अब तो गिट्टियों का ही 
आशियाना हमे भी बनाना पड़ेगा 
पर हम उसे उठाएं कैसे
पेड़ों पर ले कर जाएं कैसे
और यदि पेड़ ही ना रहे तो 
आशियाना बनाएं कहाँ 
तिनकों को जोड़ने के लिए
किसी और चीज़ की जरुरत नहीं 
पर हम तिनका लाने जाएँ कहाँ
तिनका तिनका जोड़ कर 
आशियाना बनाना आसान नहीं ...

पानी





अहा इतना पानी 
अहा इतना मीठा पानी
इतना गहरा पानी
देखो पानी में हम हैं,
सारा पानी हमारा है,
हम हैं पानी की रानी,
जीवन देने वाला पानी
जीवन बचाने वाला पानी 
हरियाली देने वाला पानी 
अहा इतना पानी 
अहा इतना मीठा पानी 
इतना गहरा पानी ...

माँ मुझे उड़ने दो





माँ मुझे उड़ने दो 
यह रिश्ता है अनोखा,
माँ जानती है अपने बच्चों को,
उसके अरमानों को,
अपनी सुविधाओं को,
फिर भी डरती है,
आसमान की उंचाई से धरती की नरमाई से 
माँ मुझे उड़ने दो,
मैं आसमान की उंचाई,
धरती की नरमाई महसूस कर सकूँ,
माँ मुझे उड़ने दो,
अपने नन्हे पंख फैला कर तुम्हे,
बारिश और धुप से बचाऊं ,
माँ मुझे उड़ने दो,
अपने देश और परदेश की दूरी नाप सकूँ ,
माँ मुझे उड़ने दो