आज एक बुलबुल की कहानी लिख रही हूँ.
यह कहानी किसी किताब में नहीं पढ़ी,यह कहानी उस बुलबुल की है जो हमारे ही बगीचे में रहती थी .
मुझे बागवानी का बेहद शौक था,अपने आंगन में गुलाब और गेंदा के बहुत से पौधे लगाई थी.
हर दिन बगीचे की देख भाल करती,सभी पौधे बड़े हो रहे थे,कुछ में फूल भी आने लगे,देख कर बहुत ख़ुशी होती थी.
गेंदा का पौधा भी बहुत बड़ा हो गया था और खूब फूल खिले थे.एक दिन हमने देखा,एक बुलबुल का जोड़ा हमारे बगीचे में बार बार आ-जा रहा है,मुझे लगा पौधों में कुछ खाना ढूंड रही होगी,एक दिन फिर बगीचे की सिचाई करते वक्त मेरा ध्यान दोनों बुलबुल की तरफ गया जो गेंदे के पेड़ में (हाँ अब वह एक बड़ा पेड़ बन गया था और उसमे करीब साठ-सत्तर फूल एक साथ लगे थे )बार-बार जा रही थी.
मैं थोड़ी देर वही खड़ी रही और बुलबुल को ध्यान से देखने लगी,दोनों बुलबुल एक-एक तिनका लाती और गेंदे के अंदर जाती.
मैं समझ गई कि वह घोसला बना रही है,बच्चों ने भी देखा.मेरे दोनों बेटों के लिए यह एक नई बात थी.
मैंने बच्चों को समझाया,तंग नहीं करना;" वह अपना घोसला बना रही है",
बच्चे स्कूल जाते और आते समय बड़े ध्यान से गेंदे के पेड़ को देखते,एक दिन शिशिर ने बताया," माँ बुलबुल के घोसले में तीन छोटे-छोटे अंडे हैं,मै बगीचे में गई,देखी तो सच में बहुत सुन्दर घोसला बना हुआ था और उसमे तीन अंडे थे.बुलबुल गेट पर बैठी थी,शायद कुछ खाना के जुगाड़ में बाहर गई थी,मै अंदर जाकर थोड़े से गेंहू के दाने ले आई और आँगन में एक जगह रख दी,मैं और शिशिर अन्दर से देखने लगे बुलबुल समझ गई थी कि दाना उसी के लिए है,वह दाना चुगने लगी.शिशिर एक कटोरे में पानी ला कर रख दिया.बस अब हम लोग प्रति दिन बुलबुल को देखते.बुलबुल भी हमे पहचानने लगी थी या अपने अंडे कि रखवाली के लिए ही आसपास रहती थी.जो भी हो,हम भी पुरे समय ध्यान रखते कि कहीं बिल्ली कि नजर न पड़े.करीब दो सप्ताह इसी तरह बीत गए,शरत और वर्मा जी का ध्यान इस तरफ नहीं था.
वेर्मा जी तो तब बलकवाडा में रहते थे.सन्डे को ही खरगोन आते थे.शरत अपनी पढ़ाई में व्यस्त था.
फिर एक दिन जब मै बगीचे में सफाई कर रही थी,मुझे चीं चीं कि आवाज सुनाई पड़ी,मैं धीरे से घोसले में झांक कर देखी,लाल-लाल छोटे-छोटे बुलबुल के बच्चे थे.
शाम को शिशिर स्कूल से आते ही जब बुलबुल के बच्चों को देखा तो बहुत खुश हुआ.
अब दोनों बुलबुल अपने तीन बच्चों के लिए आहार जुटाने में व्यस्त थे.बारी-बारी से दोनों अपनी चोंच में कुछ लाते और नन्हे-नन्हे बच्चों के मुह में डालते.
बच्चे भी अपने माता पिता की ओर देखते हुए चीं चीं करते,हमारे बगीचे की रौनक खूब बढ़ गई थी.मेरा पूरा ध्यान बस बगीचे में ही रहता.खास करके बुलबुल के घोसले पर.शिशिर ने एक फोटो भी खीच लिया.
काफी दिन बीत गए.थोड़ी ठण्ड पड़ने लगी थी.मैं और शरत,शिशिर धूप में बैठे थे.मैं अपनी बुनाई में लगी थी,तभी शिशिर ने कहा"माँ देखो अब बुलबुल के बच्चे बड़े हो गए,तभी एक बड़ी बुलबुल आई,घोसले में बैठ गयी,छोटी बुलबुल घोसले से बाहर निकल कर गेट पर जा बैठी,फिर दुसरे और तीसरे बच्चे भी गेट पर जा बैठे,बड़ी बुलबुल भी घोसले से बाहर निकल कर सामने वाले माकन की छत पर जा कर बैठ गयी.तीनों बच्चे अब अलग-अलग दिशा में उड़ चले.
कई दिनों तक मै बुलबुल कि राह देखती रही,शायद फिर से बुलबुल अपने घोसले में आएगी ;
पर नहीं आई.यह सारी बातें जब वर्मा जी को बताई तो उन्होंने कहा "अब बुलबुल यहाँ नही आएगी वह तो और कहीं अपना आशियाना बनाएगी.
बुलबुल कि याद के लिए मै उसके घोसले को कई दिनों तक सम्हाल कर रखी रही थी.
गेंदे का पेड़ भी अब सूखने लगा था.अब बस मेरे मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी,
"हमारा जीवन भी बुलबुल जैसा ही तो है,हम भी तो अपने बच्चों को अपना एक आशियाना बनाने के लिए सब कुछ सिखाते हैं.
यही सच है .
शबनम वर्मा
यह कहानी किसी किताब में नहीं पढ़ी,यह कहानी उस बुलबुल की है जो हमारे ही बगीचे में रहती थी .
मुझे बागवानी का बेहद शौक था,अपने आंगन में गुलाब और गेंदा के बहुत से पौधे लगाई थी.
हर दिन बगीचे की देख भाल करती,सभी पौधे बड़े हो रहे थे,कुछ में फूल भी आने लगे,देख कर बहुत ख़ुशी होती थी.
गेंदा का पौधा भी बहुत बड़ा हो गया था और खूब फूल खिले थे.एक दिन हमने देखा,एक बुलबुल का जोड़ा हमारे बगीचे में बार बार आ-जा रहा है,मुझे लगा पौधों में कुछ खाना ढूंड रही होगी,एक दिन फिर बगीचे की सिचाई करते वक्त मेरा ध्यान दोनों बुलबुल की तरफ गया जो गेंदे के पेड़ में (हाँ अब वह एक बड़ा पेड़ बन गया था और उसमे करीब साठ-सत्तर फूल एक साथ लगे थे )बार-बार जा रही थी.
मैं थोड़ी देर वही खड़ी रही और बुलबुल को ध्यान से देखने लगी,दोनों बुलबुल एक-एक तिनका लाती और गेंदे के अंदर जाती.
मैं समझ गई कि वह घोसला बना रही है,बच्चों ने भी देखा.मेरे दोनों बेटों के लिए यह एक नई बात थी.
मैंने बच्चों को समझाया,तंग नहीं करना;" वह अपना घोसला बना रही है",
बच्चे स्कूल जाते और आते समय बड़े ध्यान से गेंदे के पेड़ को देखते,एक दिन शिशिर ने बताया," माँ बुलबुल के घोसले में तीन छोटे-छोटे अंडे हैं,मै बगीचे में गई,देखी तो सच में बहुत सुन्दर घोसला बना हुआ था और उसमे तीन अंडे थे.बुलबुल गेट पर बैठी थी,शायद कुछ खाना के जुगाड़ में बाहर गई थी,मै अंदर जाकर थोड़े से गेंहू के दाने ले आई और आँगन में एक जगह रख दी,मैं और शिशिर अन्दर से देखने लगे बुलबुल समझ गई थी कि दाना उसी के लिए है,वह दाना चुगने लगी.शिशिर एक कटोरे में पानी ला कर रख दिया.बस अब हम लोग प्रति दिन बुलबुल को देखते.बुलबुल भी हमे पहचानने लगी थी या अपने अंडे कि रखवाली के लिए ही आसपास रहती थी.जो भी हो,हम भी पुरे समय ध्यान रखते कि कहीं बिल्ली कि नजर न पड़े.करीब दो सप्ताह इसी तरह बीत गए,शरत और वर्मा जी का ध्यान इस तरफ नहीं था.
वेर्मा जी तो तब बलकवाडा में रहते थे.सन्डे को ही खरगोन आते थे.शरत अपनी पढ़ाई में व्यस्त था.
फिर एक दिन जब मै बगीचे में सफाई कर रही थी,मुझे चीं चीं कि आवाज सुनाई पड़ी,मैं धीरे से घोसले में झांक कर देखी,लाल-लाल छोटे-छोटे बुलबुल के बच्चे थे.
शाम को शिशिर स्कूल से आते ही जब बुलबुल के बच्चों को देखा तो बहुत खुश हुआ.
अब दोनों बुलबुल अपने तीन बच्चों के लिए आहार जुटाने में व्यस्त थे.बारी-बारी से दोनों अपनी चोंच में कुछ लाते और नन्हे-नन्हे बच्चों के मुह में डालते.
बच्चे भी अपने माता पिता की ओर देखते हुए चीं चीं करते,हमारे बगीचे की रौनक खूब बढ़ गई थी.मेरा पूरा ध्यान बस बगीचे में ही रहता.खास करके बुलबुल के घोसले पर.शिशिर ने एक फोटो भी खीच लिया.
काफी दिन बीत गए.थोड़ी ठण्ड पड़ने लगी थी.मैं और शरत,शिशिर धूप में बैठे थे.मैं अपनी बुनाई में लगी थी,तभी शिशिर ने कहा"माँ देखो अब बुलबुल के बच्चे बड़े हो गए,तभी एक बड़ी बुलबुल आई,घोसले में बैठ गयी,छोटी बुलबुल घोसले से बाहर निकल कर गेट पर जा बैठी,फिर दुसरे और तीसरे बच्चे भी गेट पर जा बैठे,बड़ी बुलबुल भी घोसले से बाहर निकल कर सामने वाले माकन की छत पर जा कर बैठ गयी.तीनों बच्चे अब अलग-अलग दिशा में उड़ चले.
कई दिनों तक मै बुलबुल कि राह देखती रही,शायद फिर से बुलबुल अपने घोसले में आएगी ;
पर नहीं आई.यह सारी बातें जब वर्मा जी को बताई तो उन्होंने कहा "अब बुलबुल यहाँ नही आएगी वह तो और कहीं अपना आशियाना बनाएगी.
बुलबुल कि याद के लिए मै उसके घोसले को कई दिनों तक सम्हाल कर रखी रही थी.
गेंदे का पेड़ भी अब सूखने लगा था.अब बस मेरे मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी,
"हमारा जीवन भी बुलबुल जैसा ही तो है,हम भी तो अपने बच्चों को अपना एक आशियाना बनाने के लिए सब कुछ सिखाते हैं.
यही सच है .
शबनम वर्मा



