बुधवार, 13 मार्च 2013

डाकिया डाक लाया 


 डाकिया डाक लाया 


आज घर के काम से समय निकाल कर जब कुछ पुराने पत्रों को देखी तो मुझे मेरे द्वारा संग्रह किये गए वो डाक टिकट मिले,जिसे मैं काफी दिनों से संभाल कर रखी हूँ।
उसे देख कर पुरानी बहुत सी बातें याद आने लगी।
साथ ही आज के ज़माने में डाक टिकट के महत्व एवं उसकी ज़रूरत के बारे में भी सोचने लगी। 
समय के साथ सब कुछ बदल गया आज एस एक एस एवं ई मेल का जमाना है साथ में कूरियर  सर्विस भी।
इसी लिए डाक टिकट अब बहुत कम देखने को मिलता है।
एक समय था जब हमारे घरों के आस पास प्रतिदिन डाकिया दिखता और किसी न किसी का पत्र भी प्रतिदिन अवश्य आता था।
पत्र  को घर के सभी अवश्य पढ़ते और एक दूसरे के सुख दुःख को मानो स्वयं महसूस करते थे। 
पत्र  को संभाल  कर रखते थे पोस्टकार्ड हो या अंतर्देशियेपत्र या लिफाफा ,सभी हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण थे।
लिफाफे पर टिकट भी लगता था और अलग-अलग कीमत के लिफाफे भी मिलते थे।
मिलते तो अभी भी हैं पर अब हर घर में इन चीजों की आवश्यकता नही।मनिआर्डर तो शायद अब करते भी नहीं।
कभी कभी मुझे अपनी  पीढ़ी पर गर्व होता है की ईश्वर  ने मुझे उस पीढ़ी में जीवन दिया  जिसमे पुराने और नए दोनों समय को देखने का मौका मिला।
हमने भारतीय डाक सेवा और कूरियर सर्विस के साथ एस एम एस एवं ईमेल करना भी देखे और सीखे।
मुझे बचपन से ही पत्र लिखने का बहुत शौक था.
जब भी किसी को पत्र  लिखते तो उसके जवाब का  इंतज़ार भी बेसब्री से करती।
डाकिये का आना बहुत ख़ास बात थी।
पत्र पाकर जो ख़ुशी मिलती उसे लिख कर बताने में भी आज उतनी ही ख़ुशी महसूस कर रही हूँ,जितनी तब होती थी ।
अब कोई किसी को पत्र नहीं लिखता बस फोन पर बात होती है,मैसेज करते हैं,या ईमेल कर देते हैं।
ये सुविधाएँ बेशक पहले की तुलना में काफी अच्छी है।
परन्तु मुझे उस डाकिये की भी बहुत  याद आती है,जिसे कड़कती गर्मी हो या सर्दी या बरसात उसे तो सभी को संदेश देने जाना ही था।
पत्र चाहे कैसा भी हो उसे नहीं मालूम होता था,उसमे कौन सा संदेश है,सुख का या दुःख का।
हम भी बस अपने पत्र का ही इंतज़ार करते।डाकिये के बारे में तो कभी सोचने का मौका ही नहीं मिला।
कभी नहीं पूछे...गर्मी लगी या ठंड लगी या बारिश में गिले हुए...,हाँ पत्र को ज़रूर देखते, ठीक-ठाक है या नहीं?
अभी कुछ दिन पहले हमने देखा ,एक बाइक पर एक बड़ा सा डिब्बा लगा था,जिस पर 'भारतीय डाक सेवा' लिखा हुआ था।
बाइक सवार भी अच्छे कपड़े,जैकेट, हेलमेट पहने था।मुझे ख़ुशी हुई।नए ज़माने के डाकिये को देख कर।
परन्तु पुराने डाकिये की छवि भी याद आई,खाकी वर्दी मोटे कपड़े वाली,सर पर खाकी टोपी,कंधे पर भी खाकी रंग का ही झोला और साईकिल की सवारी।
अब सोचती हूँ उस डाकिये का काम कितना कठिन था।
आज भी छोटे शहर और गाँव में तो वही डाकिया होता होगा।
शायद पत्रों की संख्या बहुत कम हो गई होगी , ...फोन तो अब हर छोटे बड़े शहर और गाँव तक पहुँच गया है।
खैर मुझे  टिकट संग्रह करने का शौक था।
इसी लिए मैं पत्रों  को बहुत संभाल कर रखती थी।हर टिकट अलग तरह का होता था। 
कई दुर्लभ तस्वीर भी टिकट पर देखने को मिले।
यदि ध्यान से देखें तो हर टिकट अपने बारे में कुछ कहता है,सभी मुझे अपनी कहानी बताते हैं ......जैसे उन्हें कब और क्यों जारी किया गया।
और तो और हर टिकट मुझे बताता है कि वो मेरे पास कैसे पहुंचा।सभी किसी न किसी संदेश के साथ ही मेरे पास आये।
किसी टिकट के साथ शुभकामनाएं थी तो किसी के साथ कोई शुभ समाचार ,किसी के साथ सूचना तो किसी के साथ निमंत्रण,ये संदेश भी मेरे लिए उतने ही महत्वपूर्ण थे।
तब मुझे पता नहीं था,एक दिन ऐसा भी आने वाला है,जब पत्रों को टिकट की आवश्यकता नहीं होगी ,उसे कूरियर से भेज सकेंगे।
पत्र तो आज भी खूब आते हैं।सरकारी हो या गैर सरकारी सभी कूरियर द्वारा ही आते हैं।उसमे टिकट नहीं होता।
आज की पीढ़ी शायद डाक टिकट के बारे में सिर्फ किताबों में ही  जान पाएगी।......

शबनम वर्मा ...
बंगलौर - 
११ /०३ /१३