बुधवार, 25 जुलाई 2012
छोटे परिवार का बड़ा सदस्य कंप्यूटर ही है .
हम एक छोटे शहर में रहते थे वहां का माहौल बिलकुल अलग था ,तब न फोन था और नहीं कंप्यूटर ही था, तब भी सब खुश थे .आज कंप्यूटर का दर्जा सबसे ऊपर है ,होना भी चाहिय .इसी के कारन तो सब आसान हो गया है आज जब समय बदल चूका है तब बीते दिनों को याद करते हुए बहुत अजीब लगता है.बीते दिनों को याद सभी करते हैं .यह कोई नई बात नहीं है.यदि हम गुजरे वक्त को याद न करें तो आज के वक्त कि तरक्की का एहसास भी नहीं कर पाएंगे. आज से बीस वर्ष पहले मैं कम्प्यूटर को एक साधारण मशीन ही समझती थी .मेरे अनुसार सिर्फ आफिस के लिए ही आवश्यक था परन्तु हमारे घर जब कंप्यूटर आया तब मुझे लगा कि समय बिताने के लिए या मनोरंजन के लिए भी एक अच्छी चीज है .उस समय मेरे दोनों बेटे छोटे थे .छठी एवम पाचवीं क्लास में पढ़ते थे.कंप्यूटर खरीदने केलिए बैंक से लोन लिया गया था ६० हजार का .यह रकम वाकई बहुत ज्यादा थी .करीब पांचवर्ष लगे लोन चुकाने में .तब तक बच्चे बड़े हो गए थे और उसी कंप्यूटर में कुछ न कुछ नया करवाते रहते थे .काफी कुछ सीख गए थे.दोनों बच्चों को कंप्यूटर सिखने केलिए बाहर नही जाना पड़ा.यह हमारी पहली उपलब्धी थी .हाँ खर्च होता था परन्तु मन में एक संतोष रहता था कि बच्चे कुछ सिख रहे हैं .स्कूल कि पढाई पूरी हुई फिर कालेज कि भी पढाई पूरी हुई .साथ-साथ कंप्यूटर भी बड़ा होता गया.हर बार कुछ खर्च होता और मुझे लगता कि इतना पैसा सिर्फ कंप्यूटर मे ही खर्च होजाता है. देखभाल करते करते थोडा बहुत मै भी चलाना सीख गई .टायपिंग करना सीख कर कुछ कुछ टायप करने लगी थी .पर मन में एक कसक हमेशा रहती थी .लेकिन जब बेटों कि पढाई पूरी होते ही जॉब में आगये तब एक दिन यूँ ही बच्चों से किसी बात पर चर्चा चली तो मै कंप्यूटर पर हुए खर्चे की बात करने लगी.तब बड़े बेटे ने मुझे बताया कि यदि घर में कंप्यूटर नहीं होता तो हमे बाहर जाकर सीखना पड़ता और वह राशी इसकी दुगनी होती, फिरभी हम परिपक्व नहीं हो पाते कंप्यूटर में, फिर इंजीनियरिंग कि पढाई में कंप्यूटर के बिना काम भी नही चलता .आज मै देख रही हूँ कि कंप्यूटर के बिना वाकई काम करना कठिन है .आज सब के घर में कंप्यूटर है .बिजली का बिल ,फोन का बिल ,रेल टिकट, प्लेन का टिकट हो या पढाई कि चीज ,न्यूज हो या किसी से बात करनी हो या फिर मूवी देखनी हो .सब कुछ तो है इसमें .आज के समय के छोटे परिवार का बड़ा सदस्य कंप्यूटर ही है .
Chhoti Chhoti Baatein
सब कहते हैं कि उम्र के साथ जानकारी भी बढती है,
पर क्या यह सच नहीं है,कि बड़े होने के बाद बहुत सी बातें जो हमें किताबों और अपने बड़ों या अपने गुरु से नहीं पता चली,
वो छोटी या बड़ी बातें आज हमें अपने ही बच्चों से या अपने से छोटों से सीखने का मौका मिल रहा है,
इसी सन्दर्भ में अपना 'एक और' अनुभव लिख रही हूँ,
कुछ दिनों पहले कि बात है,मेरे बड़े बेटे ने जब विदेश से कुछ तस्वीरें भेजी.
उनमे कुछ तस्वीरें वहाँ के भगवान् कि भी थी,जिनके पंख भी बने हुए थे,मै बेटे से पूछी,"क्या विदेशी भगवान् पंख वाले होते है"?
तो उसने कहा, "हाँ, ठीक उसी तरह,जिस तरह अपने' देश' के "भगवान्" दस हाथ ,चार हाथ,चार सर,या सूंडवाले और पूंछ वाले होते हैं,
बात छोटी ही है, पर समझने वाली है,यही समझ मुझे मेरे बेटे ने दिया,यह मेरे लिए 'बड़ी बात' है .
वो छोटी या बड़ी बातें आज हमें अपने ही बच्चों से या अपने से छोटों से सीखने का मौका मिल रहा है,
इसी सन्दर्भ में अपना 'एक और' अनुभव लिख रही हूँ,
कुछ दिनों पहले कि बात है,मेरे बड़े बेटे ने जब विदेश से कुछ तस्वीरें भेजी.
उनमे कुछ तस्वीरें वहाँ के भगवान् कि भी थी,जिनके पंख भी बने हुए थे,मै बेटे से पूछी,"क्या विदेशी भगवान् पंख वाले होते है"?
तो उसने कहा, "हाँ, ठीक उसी तरह,जिस तरह अपने' देश' के "भगवान्" दस हाथ ,चार हाथ,चार सर,या सूंडवाले और पूंछ वाले होते हैं,
बात छोटी ही है, पर समझने वाली है,यही समझ मुझे मेरे बेटे ने दिया,यह मेरे लिए 'बड़ी बात' है .
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