शनिवार, 19 अप्रैल 2014


                 पहचान

पहचान पत्र का होना िकतना जरूरी है,
मुझे जब पता चला तब मेरी कोई पहचान नही थी।
१३ सितम्बर २००६ के बाद जब मुझसे मेरा परिचय पूछा गया,
तब मै समझ नही पाई कि ऐसा क्यों पूछा जा रहा है?
सबसे पहले बैंक आॅफ इंडिया वालों ने ही मुझे पहचानने से इन्कार किया।
बैंक मे मैं अपना परिचय 'श्री आर के वर्मा' की पत्नी के रूप मे बताई थी।
परंतु बैंक अधिकारी ने इसका प्रमाणपत्र मांगा,जो मेरे पास नही था।
बैंक अधिकारी ने साफ तौर पर कहा......,
'यदि आपके पास 'श्री आर के वर्मा' की पत्नी  होने का प्रमाण पत्र नही है तो मैं आपको नही पहचानता'।
उस दिन बात मेरी समझ मे नही आ रही थी,
अधिकारी की बात सुन कर मै चकित थी,सोच मे थी, मै कौन हूं?
मेरे पास स्थाई पता नही था। यानि मेरा कोई घर नही।
मेरी शादी का कार्ड मान्य नही था।
राशन कार्ड या लाइसेन्स जैसी कोई चीज नही थी।
किसी बैंक मे कोई खाता नही।
कई शपथ पत्र बनवाने के बाद बैंक मे खाता खुला।
फिर पासपोर्ट के लिए अर्जी दी। वहां भी सत्यापन पत्र देना पड़ा।
पासपोर्ट आॅफिस मे मेरा नाम 'शबनम' होने के कारण मेरे धर्म पर प्रश्न किया।
तब मेरे माथे पर बिन्दी का ना होना मेरे 'हिन्दु' होने पर भी एक प्रश्न था।
कई पड़ाव पार करने के बाद मेरा पहला पहचानपत्र पासपोर्ट के रूप मे बना।
जिसे दिखा कर मै अपने होने का एहसास दिला सकती हूं।
इन सब कार्य की पुष्टी होने मे पुरे दो साल लगे।
दो साल तक बिना किसी पहचान के रहना और बैंक मे मेरे प्रति कार्यवाही होना,
प्रति पल एहसास दिलाता था, मै कौन हूँ?
मै अपने महान देश मे अपनी पहचान के साथ एक  नागरिक हूं।

                                                                            --शबनम वर्मा--


Shabnam Verma
Bangalore

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें