क्या याद करूं मैं! ..........
बड़वाह से बैंगलोर तक का सफर लंबा था।
कठिन भी रहा और दुखदाई भी।
तीस साल के इस सफर में,'क्या भूलूँ....क्या याद करूँ मैं!..............?
तीस साल की कहानी मैं कागज के एक पन्ने पर मात्र तीस मिनट मे लिख सकती हूँ।
मानो कुछ ही पल बीते हों।
१९८४ से २०१४तक।
लेकिन बड़वाह मे बिताए समय को ही याद करके अपने भाग्य को सराहने का मन होता है।
असल मे मध्य प्रदेश का यह छोटा सा शहर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है।
कुछ भी खास नही होते हुए भी मेरे लिए बहुत खास था यह शहर।
जब चाहे नर्मदा के दर्शन करना,नर्मदा की लहरों मे पैर डाले घंटों बैठ कर छोटे-छोटे गोल-गोल पत्थर बीनना,
नर्मदा के कंकर- कंकर में शंकर को ढूंढना।
हम बड़वाह से ऊँकारेश्वर अक्सर ही जाते थे।
शादी के दस दिनों के बाद ही बड़वाह पहूँच गई थी।
छोटे से घर मे अपनी गृहस्थी बसा कर मैं खुश थी। कभी किसी चीज की कमी महसूस नही हुई।
खूब जोर से बातें करती,बात छोटी हो या बड़ी,जोर से हंसती थी।
खाना जो भी पकाती बहुत स्वादिष्ट लगता।
काले रंग का मिट्टी के घड़े के पानी का स्वाद अभी तक याद है।
मुरमुरे और सेव को भी नही भूला जा सकता,दाल बाफले का स्वाद पहली बार वहीं चखी थी।
बनाना भी वहीं सीखी।
टीवी की हमे तब आवश्यकता नही थी। रेडियो मे गाने सुनती,अखबार पढ़ती,सिलाई कढ़ाई करती,
समय कैसे बीत जाता, पता नही चलता था।
पता नही क्यों आस पड़ोस मे मेरी किसी से कभी दोस्ती नही हो पाई।
हां पत्र रोज लिखती किसी ना किसी को। हमारे पास भी रोज पत्र आते थे।
अब पत्रों की जगह मेल ने ले लिया।
साढ़े तीन साल बड़वाह मे रहे हम लोग।
उसके बाद हमें एक छोटे से गांव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। गांव बड़वाह से तीन-चार घंटे की ही दूरी पर था। परंतु बहुत छोटा गांव।
सीधे-साधे गांव के लोग, जिन्हे बाहरी दुनिया का ज्ञान तो था,
पर वो अपने गांव के बाहर की दुनिया से दूर ही रहना पसंद करते।
गांव मे स्कूल,अस्पताल,दुकान के नाम पर सब कुछ था पर सिर्फ नाम के लिए।
वहां के लोग खेती करते और पास के शहर मे अनाज और कपास बेच कर बाकी जरूरत का सामान लाते।जीवन जीने के लिए जितने की जरूरत होती बस उतना।
कुछ साल के बाद हम जबलपुर आ गए।
जबलपुर मध्यप्रदेश का एक बड़ा शहर है,नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर खूबसूरत है।
सारी सुविधाएँ प्राप्त है। जबलपुर मे बहुत साल बीते।
बच्चे बड़े हो गए। घर का आकार भी बढ़ा, सामान भी बढ़ा।
फिर खरगोन जाने का मौका मिला। खरगोन मे भी काफी समय तक रहे।
इन शहरों में रहते हुए हम छिन्दवाड़ा भी खूब जाते।
हम खरगोन से छिन्दवाड़ा पहूँचे। मध्य प्रदेश का छोटा लेकिन सुन्दर शहर।
छिन्दवाड़ा से जब मैं निकली तब की बातों को मैं भूलना चाहती हूँ।
बातें तो और भी हैं लिखने को,सब कुछ लिख पाना शायद सही नही।
तीस साल कैसे बीत गए? सुख-दुख आते जाते रहे,
और मै....मुस्कुराती रही!! सफर तय करती रही,सामान खरीदती और फेंकती रही!!
सामान से घर बनाती रही,घर से गृहणी बनी रही!!
इंसान सामान खरीदते-फेंकते, कब खुद सामान बन जाता है!!
सफर तय करते-करते, इसका एहसास भी नही होता!!......😊
इस कविता में वो सारी बातें लिखी हैं जो मैं नही लिख पा रही हूँ।
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
याद सुखों की आसूं लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
दोनो करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
हरिवंशराय बच्चन