Meri Baat
बुधवार, 3 सितंबर 2014
Fwd: "गुरु-शिष्य" के लिए,
---------- Forwarded message ----------
From: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>
Date: Thursday, September 4, 2014
Subject: "गुरु-शिष्य" के लिए,
To: Shabnam Verma <shabnam.rkv@gmail.com>
"गुरु-शिष्य" के लिए,
आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर देश के सभी शिक्षकों का अभिनंदन।
आज प्रधान मंत्री "श्री नरेन्द्र मोदी जी" देश के छात्रों एवं शिक्षक को संबोधित करते हुए कुछ कहना चाहते हैं।
मै उनकी इस आयोजन का समम्ान करते हुए देश के हर शहर एवं गांव, नगर,महानगर मे यदि आज के दिन एक सार्वजनिक स्थान का चयन किया जाय ।
"छात्र एवं शिक्षक " के साथ हर विद्यार्थि के "माता-पिता" या "अभिभावक" उपस्थित हो कर इस पहले एवं महत्वपूर्ण अवसर का लाभ उठाएं।
इस आयोजन के लिए "सिनेमा घर" उपयुक्त हो सकता है वहाँ बैठने की व्यवस्था एवं समस्त सुविधाएं पहले से मौजूद रहती हैं।
धन्यवाद
शबनम वर्मा
बैंगलोर (कर्नाटका)
Shabnam Verma
Bangalore
मंगलवार, 29 जुलाई 2014
पेड़ और माली
पेड़ और माली
सब की एक कहानी होती है। सबका एक समय होता है।
फलों से लदा हुआ पेड़ कभी उस एक बीज के बारे मे कहां सोचता है ? जिसे किसी माली ने बोया और सींचा था।
बीज कैसे पेड़ बना और फलों से लदा?
इस कहानी को सुनने के लिए समय कहां है? पेड़ तो अपने फलों को गिन कर ही खुश हो रहा है। माली भी अब कहां ?
उसे तो और भी कई पेड़ लगाने थे। माली की भी अपनी ही कहानी थी। बीज से पेड़, पेड़ से फल, फल से बीज के चक्र को अंजाम देता रहा। बहुत समय बीत गया पर माली कभी उस बड़े पेड़ के पास नही गया। पेड़ हर साल माली का इंतजार करता।
अचानक एक दिन माली थका हारा उस बड़े पेड़ के नीचे रूका... पेड़ खुशी से झूम कर माली का स्वागत किया। कई फल माली के कदम चूमने लगे, माली पेड़ का आकार देख कर खुश था।
फल खा कर तृप्त हुआ। थोड़ा विश्राम करने के बाद माली फिर चल पड़ा। उसी पेड़ के कुछ फल और बीज अपने हाथों मे सम्भालते हुए। वह और पेड़ लगाएगा। पेड़ भी खुशी से झूमता और इतराता रहा। पेड़ सोच रहा था....."एक बीज के बदले कई बीज माली को दे कर उसने आज माली का कर्ज चुका दिया"। माली सोच रहा था...."परिश्रम का फल मीठा था"।
जिम्मेदारी
जिम्मेदारी
गांव में एक किसान अपनी पत्नी एवं चार पुत्रों के साथ रहता था।अपने पुत्रों का विवाह यथा समय करके निशचिन्त हो गया था। परिवार मे एकता एवं खुशहाली थी परंतु किसान की पत्नी खुश नही थी। वह हमेशा चिन्तित रहती, एक दिन किसान अपनी पत्नी से उसके चिन्ता का कारण पूछा।
पत्नी बोली.. मेरी सभी पुत्रवधुएं समझदार है, मुझे समझ मे नही आ रहा कि भंडार की चाबी किसे दूँ? किसान बोला.. अरे इतनी सी बात के लिए चिन्ता क्यों करती हो?
दूसरे ही दिन सबेरे किसान ने अपनी चारों पुत्रबधुओं को अपने पास बुलाया और एक थैलै से एक - एक मुट्ठी गेहूं निकाल कर सभी बहुओं के हाथ मे दे कर बोला कि इसे ठीक से रखना, जब मैं मांगूंगा तब वापस देना।
गेहूं लेकर बहुएं अपने काम मे लग गईं। बड़ी बहू गेहूं की पोटली बना कर बक्से मे रख दी।
मंझली बहू गेहूं को कागज की पुड़िया बना कर भंडार मे रख दी। संझली बहू गेहूं अपने पल्ले मे बांध ली। छोटी बहू उसी दिन अपने मायके जा रही थी, गेहूं की पुड़िया अपने साथ ले गई।
कई दिन बीतने पर किसान की पत्नी किसान से पूछी.. आपने मुझसे चिन्ता का कारण पूछे थे, परंतु उसका निवारण तो अभी तक नही बता पाए, किसान बोला....अभी समय नही आया, जब समय आएगा मै तुम्हे बता दूंगा, अभी चाबी तुम अपने ही पास रखो,और चिन्ता मत करो।
पांच वर्ष बीत गए। किसान की पत्नी फिर एक दिन बहुत उदास थी, किसान के पूछने पर बोली, अब मैं चाबी नही रखना चाहती, आपने क्या सोचा है?
किसान उसी समय अपनी चारों बहुओं को अपने पास बुलाया और गेंहूं की पुड़िया वापस मांगा।
संझली बहू सबसे पहले अपने पल्ले मे से गेहूं के कुछ दाने निकाल कर दे दी। बड़ी बहू बक्से मे से गेहूं की पोटली निकाल कर ले आई। मंझली बहू भंडार से एक पुड़िया मे गेहूं ले आई। छोटी बहू बोली... पिताजी मुझे थोड़ी मुहलत चाहिए, अभी मेरा मायके जाना आवश्यक है। मैं दो दिन के बाद ही गेंहू वापस करूंगी। किसान बोला .....ठीक है। अब घर के वातवरण मे थोड़ी हलचल होने लगी। छोटी बहू ने गेहूं क्यों वापस नही की? आज ही मायके क्यों जाना पड़ा,वगैरह..वगैरह!!
छोटी बहू दूसरे दिन मायके से वापस आ गई साथ मे बैल गाड़ी पर गेहूं के कई बोरे भी थे। किसान और उसका पूरा परिवार आश्चर्य चकित थे,एक मट्ठी गेहूं के बदले इतना गेहूं?
छोटी बहू ने जब बताया कि किस तरह उसने मुट्ठी भर गेहूं अपने भाई के पास सुरक्षित रखने के लिए दिया,और भाई ने उसे अपने खेत मे बो दिया और उसके दानो को हर साल बीज के रूप मे इस्तेमाल किया। इस साल उसी बीज से इतनी उपज हुई, यदि पिताजी इस बार भी गेहू नही मांगते तो इसे फिर से सुरक्षित रखने के लिए खेतों मे ही बोया जाता। यह सब सुन कर सभी बहुत खुश हुए। अब किसान ने अपना फैसला सुनाया, उसने अपनी पत्नि से कहा .... अब तुम चारों बहू को अलग-अलग तरीके से घर की चाबी दे सकती हो।
बड़ी बहू को तिजौरी की चाबी दे सकती हो, मंझली बहू को अनाज के भंडार की चाबी दे दो। संझली बहू को रसोई की चाबी देना, और छोटी बहू को रूपए-पैसों की जिम्मेदारी दे दो।
किसान की पत्नी अब सारी बातें समझ गई थी, उसकी चारों बहुएं अलग-अलग तरीके से निपुण थी। अत: सब मिल कर साथ में रहते हुए गृहस्थी सम्भाल लेंगी, चिन्ता की कोई बात नही।
शबनम वर्मा
बैंगलोर
सोमवार, 28 जुलाई 2014
मातृत्व
यदि एक स्त्री मे मातृत्व के भाव वाला स्नेह है तो वह किसी भी बच्चे की मां बन सकती है, बस उसे खुद पर भरोसा करना होगा।'मां' एक शब्द नही, ना तो कोई साहित्य या किसी के द्वारा रची गई रचना है, 'मां' और 'मातृत्व' दो अलग-अलग भाव हैं, 'मा' बनना सबके बस मे नही। 'मातृत्व' का भाव सभी में होता है, बड़ी बहन अपने छोटे भाई -बहन के प्रति 'मातृत्व' की भावना रखती है, इसी तरह हर स्त्री अपने से 'छोटे' के लिए 'मातृत्व' वाला स्नेह रखती है।
क्या याद करूं मै
क्या याद करूं मैं! ..........
बड़वाह से बैंगलोर तक का सफर लंबा था।
कठिन भी रहा और दुखदाई भी।
तीस साल के इस सफर में,'क्या भूलूँ....क्या याद करूँ मैं!..............?
तीस साल की कहानी मैं कागज के एक पन्ने पर मात्र तीस मिनट मे लिख सकती हूँ।
मानो कुछ ही पल बीते हों।
१९८४ से २०१४तक।
लेकिन बड़वाह मे बिताए समय को ही याद करके अपने भाग्य को सराहने का मन होता है।
असल मे मध्य प्रदेश का यह छोटा सा शहर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है।
कुछ भी खास नही होते हुए भी मेरे लिए बहुत खास था यह शहर।
जब चाहे नर्मदा के दर्शन करना,नर्मदा की लहरों मे पैर डाले घंटों बैठ कर छोटे-छोटे गोल-गोल पत्थर बीनना,
नर्मदा के कंकर- कंकर में शंकर को ढूंढना।
हम बड़वाह से ऊँकारेश्वर अक्सर ही जाते थे।
शादी के दस दिनों के बाद ही बड़वाह पहूँच गई थी।
छोटे से घर मे अपनी गृहस्थी बसा कर मैं खुश थी। कभी किसी चीज की कमी महसूस नही हुई।
खूब जोर से बातें करती,बात छोटी हो या बड़ी,जोर से हंसती थी।
खाना जो भी पकाती बहुत स्वादिष्ट लगता।
काले रंग का मिट्टी के घड़े के पानी का स्वाद अभी तक याद है।
मुरमुरे और सेव को भी नही भूला जा सकता,दाल बाफले का स्वाद पहली बार वहीं चखी थी।
बनाना भी वहीं सीखी।
टीवी की हमे तब आवश्यकता नही थी। रेडियो मे गाने सुनती,अखबार पढ़ती,सिलाई कढ़ाई करती,
समय कैसे बीत जाता, पता नही चलता था।
पता नही क्यों आस पड़ोस मे मेरी किसी से कभी दोस्ती नही हो पाई।
हां पत्र रोज लिखती किसी ना किसी को। हमारे पास भी रोज पत्र आते थे।
अब पत्रों की जगह मेल ने ले लिया।
साढ़े तीन साल बड़वाह मे रहे हम लोग।
उसके बाद हमें एक छोटे से गांव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। गांव बड़वाह से तीन-चार घंटे की ही दूरी पर था। परंतु बहुत छोटा गांव।
सीधे-साधे गांव के लोग, जिन्हे बाहरी दुनिया का ज्ञान तो था,
पर वो अपने गांव के बाहर की दुनिया से दूर ही रहना पसंद करते।
गांव मे स्कूल,अस्पताल,दुकान के नाम पर सब कुछ था पर सिर्फ नाम के लिए।
वहां के लोग खेती करते और पास के शहर मे अनाज और कपास बेच कर बाकी जरूरत का सामान लाते।जीवन जीने के लिए जितने की जरूरत होती बस उतना।
कुछ साल के बाद हम जबलपुर आ गए।
जबलपुर मध्यप्रदेश का एक बड़ा शहर है,नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर खूबसूरत है।
सारी सुविधाएँ प्राप्त है। जबलपुर मे बहुत साल बीते।
बच्चे बड़े हो गए। घर का आकार भी बढ़ा, सामान भी बढ़ा।
फिर खरगोन जाने का मौका मिला। खरगोन मे भी काफी समय तक रहे।
इन शहरों में रहते हुए हम छिन्दवाड़ा भी खूब जाते।
हम खरगोन से छिन्दवाड़ा पहूँचे। मध्य प्रदेश का छोटा लेकिन सुन्दर शहर।
छिन्दवाड़ा से जब मैं निकली तब की बातों को मैं भूलना चाहती हूँ।
बातें तो और भी हैं लिखने को,सब कुछ लिख पाना शायद सही नही।
तीस साल कैसे बीत गए? सुख-दुख आते जाते रहे,
और मै....मुस्कुराती रही!! सफर तय करती रही,सामान खरीदती और फेंकती रही!!
सामान से घर बनाती रही,घर से गृहणी बनी रही!!
इंसान सामान खरीदते-फेंकते, कब खुद सामान बन जाता है!!
सफर तय करते-करते, इसका एहसास भी नही होता!!......😊
इस कविता में वो सारी बातें लिखी हैं जो मैं नही लिख पा रही हूँ।
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
याद सुखों की आसूं लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
दोनो करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
हरिवंशराय बच्चन
अनहोनी
अनहोनी
'अनहोनी' मंदिर पचमढ़ी के पास है, हम पचमढ़ी से लौट रहे थे, 'अनहोनी' माता के दर्शन करने मंदिर तक गए। वहां के पुजारी ने हमे देवी मां की महत्ता बताए।
वहां एक गर्म पानी का कुन्ड प्राकृतिक रूप से है।
सिर्फ गरम ही नही बल्कि खौलता हुआ पानी। कहा जाता है कि उस पानी से नहाने वाले को चर्म रोग नही होता, यदि चर्मरोग है तो वह पूर्ण रूप से रोग से छुटकारा पा सकता है, है ना आश्चर्य की बात?
हां यही 'अनहोनी' बात है उस मंदिर की और कुन्ड मे नहाने की। हम भी इस आश्चर्य को देखने पहूंचे। वहां और भी कई लोग थे। देवी की पूजा गरम पानी मे नहाने के बाद ही करनी थी।
लोटे से पानी निकाल कर धीरे-धीरे अपने ऊपर डाल कर नहाना था,या यूं कहें कि उस पानी को अपने ऊपर छिड़कना था।
मै और दीदी महिलाओं वाली घाट पर नहा लिए। ये जीजाजी के साथ थे, दोनो नहा कर कपड़े बदल चुके थे।
तभी जीजाजी की आवाज आई...रवि गिर गया.... मै दौड़ी कुंड के पास, वहां जो देखी वह बहुत भयानक था।
ये गरम कुंड में गिरे थे, चिल्ला रहे थे....मैं जल रहा हूं....मुझे बचाओ....बचाओ...बचाओ,
मैं दीदी और जीजाजी कुंड के पास थे पर हम कुछ भी नही कर पा रहे थे। कुछ देर कोशिश करने के बाद ये स्वयं ही बाहर निकले। मै दूसरे कपड़े दी। कपड़े बदल कर वहीं चारपाई पर लेटे।
बहुत डरे हुए थे,खूब जलन हो रही थी। हाथ पैर मे चोट भी लगी थी।
बाद मे वहां के पंडित ने बताया कि किस तरह लोग 'चर्म रोग' के इलाज के लिए आते हैं, परंतु कईयों के साथ ऐसा भी हुआ कि इसी कुंड मे गिरे और पूरी 'चमड़ी' ही उधड़ गई।
यही 'अनहोनी'.....जो 'हो' गई थी......!!
वो पांच दिन
वो पांच दिन
हां यह कहानी उन पूरे पांच दिनों की है जब 'काल' मेरे घर में आया था। उन पांच दिनों तक मैं रोज सुबह उठती और अपने परिवार को उस 'काल' से बचाने का प्रयास करती। उन पांच दिनों में हर पल चौकन्नी रहती अपने ही घर में छिपती-बचती दिन भर बच्चों को लेकर पलंग पर ही बैठी रहती। मेरे पति और देवर मेरी बातों का विश्वास नही करते थे। पांच िदन मे मुझे कई बार डांट पड़ी। झूठी भी कहा गया। डरपोक और शक्की का खिताब भी दिया गया।
खैर अब पूरी घटना बताती हूँ।
उस दिन धनतेरस का दिन था। मैं रोज सुबह जल्दी ही जाग जाती थी। उस दिन भी जल्दी जाग कर पूजा की तैयारी करनी थी।
सुबह जब बाथरूम मे गई तब थोड़ा अंधेरा ही था।
मै नहा कर आ गई,पूजा की अौर नाश्ता बना कर बच्चों को जगाई, छोटे बेटे को गोद मे लेकर बाथरूम मे गई, वहां का नजारा देखते ही मेरे होश उड़ गए। बहुत बड़ा काले रंग का नाग अपने रौद्र रूप मे बैठा था। मै डरी हुई भाग कर सबको बताई कि बाथरूम में काला नाग बैठा है।
दोनो भाई दौड़े और बाथरूम में देख कर आए, बोले वहां तो कुछ भी नही। मुझे डांट कर वो लोग नहा धो कर तैयार हुए और अाॅफिस चले गए।
मैं डरी हुई थी। बच्चों को पड़ोसी के घर के बाथरूम मे ले गई। शाम को जब इन्हे पता चला कि मैं और बच्चे पड़ोसी का बाथरूम इस्तेमाल कर रहे हैं, तब खूब डांट पड़ी।
लेकिन मै अपने घर का बाथरूम इस्तेमाल करने को तैयार नही थी। बच्चों को भी नही जाने देती। ये और देवर रोज उसी बाथरूम में जाते। दीवाली के दिन हिम्मत कर के मै जब अपने घर के बाथरूम मे गई तब फिर नाग कोने मे ही बैठा था। मैं भाग कर आई और रोने लगी।
ये जाकर देखे और मुझे ना जाने क्या-क्या बोले। शाम को मैं जैसे-तैसे पूजा की, पर डर तो लग ही रहा था। पड़ोस की भाभी जी अच्छी थी, मेरी बात पर विश्वास करके अपना बाथरूम इस्तेमाल करने देती थी।
दीवाली के दूसरे दिन भी नाग सिर्फ मुझे ही दिखा और उस दिन भी मुझे डांट पड़ी।
भाईदूज के दिन मै बोली...यदि आप लोगों को मुझ पर विश्वास नही और पड़ोसी के बाथरूम को इस्तेमाल करने पर एतराज है...तो बच्चों को खुद नहला कर तैयार करें..!
ये मेरी बात मान गए और बेटे को लेकर बाथरूम मे गए, अगले ही पल वापस आकर बोले ...अरे सच मे बहुत 'बड़ा 'है, इतना बड़ा कि उसे मारना अपने 'बस' की बात नही.!
अब हथियार की तलाश शुरू हुई, आस-पास के लोग आ गये। बहुत मेहनत करके उसे मारा गया।
'वो' 'पांच दिन' से हमारे घर में था। सिर्फ मुझे डराता था। सबने कहा कि नाग की पूजा करो, ईश्वर को धन्यवाद कहो, घर में पांच दिन तक रहने के बावजूद उसने हमें कोई नुकसान नही पहुंचाया। हमने नारियल और अगरबत्ती से शंकर जी की पूजा किये और 'जान बची तो लाखों पाए' मंत्र का जाप किए।
शायद 'उसे' मुक्ती चाहिए थी। जो भी हो 'वो पांच दिन' भयानक थे, कष्टदाई भी।
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