बीते हुए समय यादों में जीवित रहते हैं।
उसे चाह कर भी वर्तमान से नहीं जोड़ा जा सकता।
जब हम छिन्दवाड़ा में खेत वाले घर में रहते थे।
वहां परेशानियों कि तो कोई कमी नहीं थी,फिर भी सभी खूब जोर से हँसते थे।
परेशानियों के बावजूद भी यदि इन्सान खुश रहे,इसे जिन्दादिली ही कहेंगे।
क्या खाए?क्या पहने?इन बातों से हट कर,सब एक दुसरे के सुख दुःख में शामिल रहते थे।
उन्ही दिनों कि बात है,१९८७ फरवरी में एक दिन खूब बारिश हुई और खूब ओले भी गिरे थे।
इतने ओले मैंने पहली बार ह़ी देखे थे।
पूरा खेत बर्फ से ढक चुका था,खपड़े वाले छत टूट गए,सारे ओले और पानी घर
के अन्दर आने लगे।
परिवार के सारे सदस्य एकसाथ एक ह़ी जगह इकट्ठे हो कर ईश्वर को याद करने लगे।
कच्चा घर होने के कारण घर के अन्दर भी कीचड़ हो गया था,
वहां से कही भी जाने के लिए कोई रास्ता भी नहीं,घर के चारों तरफ खेत था
और वह ओले से ढका हुआ था,मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
दादी ने मुझसे आग जलाने के लिए कहा,मै एक बड़े से तसले में लकड़ी और कंडे
रख कर आग जलाने कि कोशिश करने लगी।
परन्तु अग्नि देव का तो कहीं नामों-निशान भी नहीं था।सब कुछ तो गीला और
ठंडा हो चुका था।
हम सब लोग मिल कर,रुई,कपडा,कपूर,और मिट्टी का तेल डाल कर किसी तरह आग
जलाने की भरपूर कोशिश में जुट कर सारी चिताओं से मुक्त थे।
कोई पंखा हिला रहा था,तो कोई फुकनी से फूंक रहा था,
पूरे घर में धुंआ ह़ीधुंआ हो गया।
काफी देर के बाद अग्नि देव प्रसन्न हुए,हम लोगों कि ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
आग कि गर्मी में सब अपने हाथ सेंकने लगे।
तब तक बारिश बंद हो चुकी थी,हाँ बर्फ सारे खेत में फैली हुई थी।
चारों तरफ कि धरती एकदम सफेद,
काफी देर के बाद अग्नि देव प्रसन्न हुए,हम लोगों कि ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
आग कि गर्मी में सब अपने हाथ सेंकने लगे।
तब तक बारिश बंद हो चुकी थी,हाँ बर्फ सारे खेत में फैली हुई थी।
चारों तरफ कि धरती एकदम सफेद,
इस एक घटना से ह़ी मुझे समझ में आ गया कि
'गांव के लोगों का जीवन कितना कठिन है ?
उस वक्त किसी को भूख नहीं लगी,किसी को नींद भी नहीं आई,सब एक साथ आग
जलाने कि कोशिश में जुटे रहे।
जब आग जली तब ऐसा लगा जैसे अब कोई परेशानी नहीं।
सच में ऐसा ह़ी हुआ,धीरे-धीरे सब अपने-अपने कमरों कि सफाई में लग गए,
'गांव के लोगों का जीवन कितना कठिन है ?
उस वक्त किसी को भूख नहीं लगी,किसी को नींद भी नहीं आई,सब एक साथ आग
जलाने कि कोशिश में जुटे रहे।
जब आग जली तब ऐसा लगा जैसे अब कोई परेशानी नहीं।
सच में ऐसा ह़ी हुआ,धीरे-धीरे सब अपने-अपने कमरों कि सफाई में लग गए,
दिन से रात हो गई।
किसी तरह सबने मिल कर कुछ खाने का भी इंतजाम किया,
किसी तरह सबने मिल कर कुछ खाने का भी इंतजाम किया,
बच्चों को खाना,दूधखिला-पिला कर सुला दिए।
हम सभी लोग किस्से कहानियाँ सुनते हुए सुबह का इंतजार करने लगे।
दादी खूब अच्छी-अच्छी कहानी सुना रही थी।
आज सोचती हूँ "वह भी क्या दिन थे ?
बिना साधन के कठिनाईयों से लड़ कर खुश रहते थे।
हम सभी लोग किस्से कहानियाँ सुनते हुए सुबह का इंतजार करने लगे।
दादी खूब अच्छी-अच्छी कहानी सुना रही थी।
आज सोचती हूँ "वह भी क्या दिन थे ?
बिना साधन के कठिनाईयों से लड़ कर खुश रहते थे।
यही है जिन्दगी
शबनम वर्मा ...
बंगलौर ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें