रविवार, 26 मई 2013

छोटी-छोटी बातें

सब कहते हैं कि उम्र के साथ जानकारी भी बढती है, पर क्या यह सच नहीं है,कि बड़े होने के बाद बहुत सी बातें जो हमें किताबों और अपने बड़ों या अपने गुरु से नहीं पता चली, वो छोटी या बड़ी बातें आज हमें अपने ही बच्चों से या अपने से छोटों से सिखने का मौका मिल रहा है, इसी सन्दर्भ में अपना अनुभव लिख रही हूँ.

"रामायण और महाभारत" कि "कथाएँ" बचपन से ही सुनती आ रही हूँ, और जब थोड़ी बड़ी हुई तब पता चला कि " त्रेता युग और द्वापर" युग कि निशानियाँ अभी भी मौजूद है, जैसे "भगवान राम-सीता"के पद चिन्ह,या "श्री कृष्ण" के " पद चिन्ह" और भी कई" युग पुरुष"  कि निशानियाँ. बचपन में एक सवाल मन में उठा कि"पद चिन्ह"तो मिट सकते हैं, फिर कैसे अभी तक मौजूद है?
फिर एक सवाल मन में आया कि क्या" रामजी "के या सभी "युग पुरुष "के हाथ पैर इतने कठोर थे,कि निशान बन जाते थे?

तब यह सवाल मैं अपनी" दादी और नानी" से पूछी, पर उन्होंने "भगवान कि लीला अपरम्पार" कह दिया. फिर यही सवाल जब अपनी" माँ और बाबूजी" से पूछी तो उन्होंने भी ये कह कर टाल दिए कि तब"सतयुग"था और सब"ईश्वर"कि"लीला"थी. परन्तु मेरा सवाल वहीँ के वहीँ था. फिर कई साल के बाद मेरे"बच्चों"ने भी"यही सवाल"मुझसे भी पूछा,जब टीवी पर"रामायण और महाभारत"जैसी धार्मिक-धारावाहिक प्रसारित होने लगा, मैं भी उन्हें वही सब बताई जो मुझे बताया गया था. समय बीता बच्चे बड़े हुए स्कूल और कॉलेज कि पढ़ाई पूरी कर लिए पर मेरे मन में वही सवाल आज भी थे. और जो जवाब मुझे बताया गया था,मै उससे संतुस्ट नहीं थी।

फिर एक दिन टीवी पर वही सब प्रसारित हो रहा था, और उसमे बता रहे थे "राम और सीता के पद चिन्हों" के बारे में,तब टीवी देखते-देखते ही मै अपने छोटे बेटे से इन बातों का जिक्र करने लगी और"मैं बोली कि कुछ भी बताते हैं,ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि पदचिन्ह अभी तक हों क्या "रामजी और सीताजी" के पैर इतने कठोर थे? मेरी बात सुनते ही बेटे ने जवाब दिया, " पैर कठोर नहीं थे, माँ "धरती नर्म" थी. यह जवाब मुझे एकदम "सही" लगा, मै आश्चर्य चकित होकर बेटे से बोली, आज वर्षों बाद मुझे सही जवाब मिला, वह भी मेरे बेटे से, मैं तो धन्य हो गई.
 
वर्षों से जो सवाल मेरे मन में चल रहा था,उसका जवाब इतने"छोटे शब्दों"में पूरी ऐतिहासिक घटना एकदम साफ हो गई.

शबनम

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